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AUSHADH DRAVY SANGRAH

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औषध द्रव्य संग्रह

•प्रशस्त भूमि

जिस भूमि में हर दृष्टिकोण से प्रशस्त ( उत्तम ) गुणों से युक्त भेषज उत्पन्न होती है , वह प्रशस्त भूमि कहलाती है । बृहत्त्रयी में प्रशस्त भूमि के लक्षण विस्तारपूर्वक वर्णित हैं –

•महर्षि सुश्रुत के अनुसार जो भूमि खड्डों या बिलों से , कंकड़ – पत्थरों से रहित हो , श्मशान – फांसी के स्थान – वध स्थान – देवता के स्थान एवं बालुका प्रदेश से दूर हो , ऊषर ( क्षार ) रहित हो , न हो , जलाशय के निकट हो अथवा जिस भूमि को खोदने पर जल ज्यादा दूर ( नीचे ) न हो , स्निग्ध हो , दूर्वा – घास आदि ( प्ररोह ) से युक्त हो , मृदु हो , स्थिर और समतल हो , काली – श्वेत या रक्त वर्ण की ( मिट्टी से युक्त ) हो , वह प्रशस्त भूमि है ।

• महर्षि चरक ने प्रशस्त भूमि के कुछ लक्षण और बताये हैं , यथा – जो भूमि जाङ्गल या साधारण देश में हो , जहाँ यथा समय उचित मात्रा में शीत , धूप , वायु और जल उपलब्ध हो , भूमि के दक्षिण भाग में जलाशय हो , यजनागार और सभागार से दूर हो , उपवन आदि से रहित हो , मधुर और कृष्ण वर्ण की मिट्टी से युक्त हो , जिसमें हल न चलाया गया हो , जहाँ अन्य कोई बड़ा पेड़ न हो , ऐसी भूमि प्रशस्त ( उत्तम ) कही जाती है ।

औषध संग्रह – विधि

औषध संग्रहण करने वाला व्यक्ति मंगलाचार सम्पन्न , कल्याण की भावना रखते हुए , पवित्र श्वेत वस्त्रधारण करके देवता , अश्विनी कुमारों , गौ एवं ब्राह्मण की पूजा करके उस दिन उपवास ( व्रत ) धारण कर पूरब या उत्तर दिशा की ओर मुख करके प्रशस्त भूमि में उत्पन्न एवं प्रशस्त लक्षणों से युक्त औषध का पुष्य , अश्विनी या मृगशिरा नक्षत्र में संग्रहण करें । आचार्य शार्ङ्गधर के अनुसार प्रसन्नचित होकर , पवित्र होकर , प्रात : काल , शुभदिन ( वार ) में सूर्य की ओर मुख करके , मौन धारण कर तथा हृदय में शिव को प्रणाम कर औषधियों को ग्रहण करना चाहिए ।

• आचार्य चरक के मत के अनुसार

•नूतन शाखा- वर्षा एवं बसन्त ऋतु में संग्रह करना चाहिए । •नूतन ( नये ) पत्र- बसन्त ऋतु में , पुष्प के विकसित होने से पहले ।
•प्ररूढ़ ( प्रौढ़ या परिपक्व ) पत्र- वर्षा ऋतु में ।
•मूल – ग्रीष्म या शिशिर ऋतु में जब परिपक्व पत्ते झड़ गये हों ।
•त्वक् , कन्द , क्षीर- शरद् ऋतु में ।
•सार- हेमन्त ऋतु में ।
•पुष्प एवं फल – यथा ऋतु अर्थात् जिस ऋतु में पुष्प खिलते हों और फल परिपक्व होते हों , उसी ऋतु में उनका संग्रह करना चाहिए ।

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