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KSHAPANAK KATHA BHAG -2

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अथ अपरीक्षितकारकम्

१.क्षपणक कथा भाग -2

“व्याधितेन सशोकेन चिन्ताग्रस्तेन जन्तुना ।
कामार्तेनाऽथ मत्तेन दृष्टः स्वप्नो निरर्थकः “।।११।।

अनुवाद – व्याधियुक्त अर्थात् रोगी , शोकग्रस्त , चिन्ताग्रस्त , कामवासना से पीड़ित तथा उन्मत प्राणी जो भी स्वप्न देखता है वह निरर्थक ही होता है।

एतस्मिन्नन्तरे तस्य भार्यया कश्चिन्नापित : पादप्रक्षालनायाहूतः । अत्रान्तरे च यथा निर्दिश्टः क्षपणकः सहसा प्रादुर्बभूव । अथ स तमालोक्य प्रहृष्टमना यथा सन्नकाष्ठदण्डेन तं शिरस्यताडयत् । सोऽपि सुवर्णमयो भूत्वा तत्क्षणाद्भूमौ निपतितः । अथं तं स श्रेष्ठी निभृतं स्वगृहमध्ये कृत्वा , नापितं सन्तोष्य प्रोवाच ‘ तदेत धनं , वस्त्राणि च मया दत्तानि गृहाण । भद्र ! पुन : कस्यचिन्नाख्येयोऽयं वृत्तान्तः ।

‘ नापितोऽपि स्वगृहं गत्वा व्यचिन्तयत्- ” नूनमेते सर्वेऽपि नग्नकाः शिरसि ताडिताः कांचनमया भवन्ति । तदहमपि प्रात : प्रभूतानाहूय लगुडैः शिरसि हन्मि , येन प्रभूतं हाटक मे भवति । ” एवं चिन्तयतो महता कष्टेन निशां व्यतिचक्राम ।

अथ प्रभातेऽभ्युत्थाय वृहल्लगुडमेकं प्रगुणीकृत्य , क्षपणकविहारं गत्वा जिनेन्द्रस्य प्रदक्षिणात्रयं विधाय , जानुभ्यामवनिं गत्वा वक्त्रद्वारन्यस्तोत्तरीयांचलस्तार स्वरेणेमं श्लोकमपठत् –

अनुवाद – इसी बीच उसकी पत्नी ने पैर धोने के लिए किसी नाई को बुलाया । और इसी बीच जैसा बताया गया था ( जैसा ) जैन साधु सहसा प्रकट हो गया । इसके बाद उसने उसे देखकर प्रसन्न मन से जैसा कहा गया था , सेठ ने समीप स्थित लकड़ी के डण्डे से उसके सिर पर प्रहार किया । वह भी सोने का होकर उसो खण पृथ्वी पर गिर पड़ा । तत्पश्चात् उसको घरमें छिपाकर नाई को सन्तुष्ट करके वह सेठ बोला- ” मेरे द्वारा दिये गए इस धन और वस्त्रों को ग्रहण करो , किन्तु हे भाई । यह समाचार ( तुम ) किसी से नहीं कहना ।

नाई ने भी अपने घर जाकर विचार किया- ” निश्चय ही सिर पर मारे गये ये सभी नग्न ( साधु ) सोने के हो जाते हैं । तो मै प्रात : बहुतों को बुलाकर डण्डों से सिर पर प्रहार करूँगा । रात्रि को व्यतीत किया । जिससे मेरे पास बहुत सा सोना हो जायगा । ‘ इस प्रकार सोचते हुए ( उसने ) अत्यधिक कष्टपूर्वक रात्रि को व्यतीत किया ।

तब प्रातः काल उठकर एक लम्बे डण्डे को भली प्रकार तैयार करके , जैन साधुओं के मठ में जाकर जिन – प्रमुख ( जितेन्द्र ) को तीन बार प्रदक्षिणा करके घुटनों से पृथ्वी पर झुककर , मुखद्वार पर उत्तरीय वस्त्र को रखकर ( उसने ) ऊँचे स्वर में यह श्लोक पढ़ा :-

“जयन्ति ते जिना येषां केवलज्ञानशालिनाम् ।
आजन्म : स्मरोत्पत्तौ मानसेनोपरायितम् “।१२ ।।

अनुवाद – एकमात्र ज्ञान सम्पन्न उन जैन साधुओं की विजय होवे , जिन्होंने जन्म से ( ही ) कामदेव की उत्पत्ति के विषय मे मन को बंजर बना लिया है अर्थात् जिनके मन में कामविकार नहीं होता ।

“सा जिहा या जिनं स्तौति तच्चित्तं यज्जिने रतम् ।
तौ एव तु करौ श्लाघ्यौ यो तत्पूजाकरौ करौ” ।१३ ॥

अनुवाद – वही ( वस्तुतः ) जिभ है जो जिन ( जैन साधु ) की स्तुति करती है , वही ( वस्तत 🙂 मन है . जो जैन साधओं में लगा हुआ है तथा वे दोनों ही ( वस्तत 🙂 प्रशंसनीय हाथ है जो उन की पूजा में लगे हुए हैं।

“ध्यानव्याजमुपेत्य चिन्तयसि कामुन्मील्य चक्षुः क्षणं पश्यानङ्गशरातुरं जनमिमं त्राताऽपि नो रक्षसि । मिथ्याकारूणिकोऽसि निपुणतरस्त्वत्तः कुतोऽन्यः पुमान् सेयॆ मारवधूभिरित्यभिहितो बौद्धो जिनः पातु वः “।१४ ।।

अनुवाद- ध्यान का बहाना बनाकर ( तुम ) किस सुन्दरी का चिन्तन कर रहे हो ? क्षणभर के लिये आँखें खोलकर कामदेव के बाणों से व्यथित इन जन को ( तो ) देखो , रक्षक होते हुए भी ( तुम हमारी ) रक्षा नहीं कर रहे हो । व्यर्थ में ही तुम दयालु कहलाते हो । तुमसे अधिक निष्ठुर पुरूष कोईओर नहीं है । इस प्रकार अप्सराओं द्वारा ईर्ष्यापूर्वक कहे गए ज्ञानसम्पन्न जैन तीर्थकर ( महाराज ) आप सबकी रक्षा करें ।

“एवं संस्तुत्य , ततः प्रधानक्षपणकमासाद्य क्षितिनिहितजानुचरण : ” नमोऽस्तु , वन्दे ” इत्युच्चार्य लब्धधर्मवृद्धयाशीर्वादः सुखमालिकाऽनुग्रहलब्धव्रतादेश उत्तरीय निबद्धग्रन्थिः सप्रश्रयमिदमाह- ” भगवन् ! अद्य विरहणक्रिया समस्तमुनिसमेतेनास्मद्गृहे कर्त्तव्या ।

” स आह- ” भो श्रावक ! धर्मज्ञोऽपि किमेव वदसि , किं वयं ब्राह्मणसमाना तत् आमन्त्रणं करोपि ? वयं सदैव तत्कालपरिचर्यया भ्रमन्तो भक्तिभाज श्रावकमवलोक्य तस्य गृहं गच्छामः । तेन कृच्छ्राऽदभ्यर्थितास्तद्गृहे प्राणधारणमात्रामशनक्रिया कुर्मः । तद्गम्यताम् नैवं भूयोऽपि वाच्यम् ।। “

” अनुवाद – इस प्रकार स्तुति करके , उसके बाद मुख्य क्षपणक के पास जाकर , पैर एवं घुटनों पृथ्वी पर रखकर नमस्कार होवे , मैं आपकी वन्दना करता हूँ , इस प्रकार कहकर , धर्म की वृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त करके , कण्ठी- मालारूप अनुग्रह से व्रत का आदेश प्राप्त करके , दुपट्टे की गाँठ बाँधे हुए ( उसने ) विनम्रतापूर्वक यह कहा ” भगवन् ! सभी मुनियों के साथ आज की पारणा ( भोजन क्रिया ) हमारे घर पर कीजिएगा ।

वह बोला – ” अरे श्रावक धर्म ज्ञाता होते हुए भी ऐसा क्यों कह रहे हो ? क्या हम ब्राह्मणों के समान है जो ( हमें ) आमन्त्रित कर रहे हो । हम तो हमेशा उस भोजन समय की उपासना द्वारा घूमते हुए , भक्तिभाव से युक्त श्रावक को देखकर उसे घर पर चले जाते है तथा उसके द्वारा अत्यधिक प्रार्थना किये गए ( हम ) उसके घर में मुश्किल से प्राणधारणमात्र भोजन करते हैं । इसलिए चले जाओ , फिर कभी ऐसा नहीं कहना ! “

“तच्श्रुत्वा नापित आह : “ भगवन् ! वेम्यहं युष्मद्धर्मम् । परं भवतो बहवः श्रावका आह्वयन्ति । साम्प्रतं पुनः पुस्तकाच्छादनयोग्यानि कर्पटानि बहुमूल्यानि प्रगुणीकृतानि । तथा पुस्तकानां लेखनाय , लेखकानां च वित्तं संचितमास्ते । तत्सर्वथा कालोचित्तं कार्यम् ।”

” ततो नापितोऽपि स्वगृहं गतः । तत्र च गत्वा खादिरमयं लगुडं सज्जीकृत्य , कपाटयुगलद्वारि समाधाय सार्द्धप्रहरैकसमये भूयोऽपि विहारद्वारमाश्रित्य सर्वान्क्रमेण निष्क्रामतो गुरुप्रार्थनया स्वगृहमानयत । तेऽपि सर्वे कर्पटवित्तलोभेन भक्तियुक्तानपि परिचित श्रावकान् परित्यज्य प्रहष्टमनसस्तस्य पृष्ठतो ययुः । अथवा साध्विदमुच्यते –

अनुवाद- उसे सुनकर नाई बोला – भगवन् ! मैं आपके धर्म को जानता हूँ । किन्तु आपके बहुत से श्रावक ( आपको ) बुलाते रहते हैं , फिर ( मैने ) इस समय पुस्तकों को ढकने योग्य मूल्यवान् कपड़े इकट्ठे किये हुए हैं तथा पुस्तकों को लिखवाने हेतु लेखकों का धन भी एकत्र किया हुआ है । इसलिए आपको सब प्रकार से विचार करना चाहिए ।

उसके बाद नाई भी अपने घर चला गया और वहाँ जाकर खैर की लकड़ी का डण्डा तैयार करके , दोनों किवाडो पर रखकर , डेढ़ प्रहर होने पर पुनः क्षपणक विहार के द्वार पर पहुँच कर , क्रमश : अत्यधिक प्रार्थनापूर्वक बाहर निकलते हुए ( उन्हे ) अपने घर ले आया । कपड़े तथा धन के लोभ से ये सब भी परिचित एवं भक्तियुक्त श्रावको को भी छोड़कर प्रसन्न मन से उसके पीछे चल दिए । अथवा वह ठीक कहा जाता है –

“एकाकी गृहसन्त्यक्तः पाणिपात्रो दिगम्बरः । सोऽपि संवाह्यते लोके तृष्णया पश्य कौतुकम् ।”१५ ।।

अनुवाद – यह आश्चर्य देखो , अकेला . घर को पूरी तरह त्यागने वाला , हाथ को ही पात्ररूप में प्रयोग करने वाला , दिशाएँ ही जिसके वस्त्र है । वह भी त्यागी मनुष्य संसार में तृष्णा द्वारा लालसाओं में पड़ जाता है ।

“जीर्यन्ते जीर्यत : केशा दन्ता जीर्यन्ति जीर्यतः । चक्षु श्रोत्रे च जीर्येते , तृष्णैका तरूणायते “।।१६ ।।

अनुवाद वृद्ध होने पर व्यक्ति के बालजीर्ण हो जाते हैं । वृद्ध होने पर व्यक्ति के दाँत जीर्ण हो जाते हैं । नेत्र और कान ( भी ) जीर्ण हो जाते हैं । एकमात्र तृष्णा ही तरूणी के समान आचरण करती है ।

“ततः परं गृहमध्ये तान् प्रवेश्य , द्वारं निभृतं पिधाय , लगुडप्रहारैः शिरस्य ताडयत् ।
तेपि ताड्यमाना एके मृताः , अन्ये भिन्नमस्तका : फूत्कर्तुमुपचक्रमिरे । अत्रान्तरे तमाक्रन्दमाकर्ण्य , कोटरक्षपालेनाभिहितम् – ” भोः ! किमयं कोलाहलो नगरमध्ये तद्गम्यताम् ।

” ते च सर्वे तदादेशकारिणस्तत्सहिता वेगात्तद्गृहं गता यावत्पश्यन्ति तावद्रुधि रप्लावितदेहा : पलायमाना नग्नका दृष्टाः पृष्टाश्च “ भो किमेतत् ? ” ते प्रोचुर्यथाऽवस्थितं नापितवृत्तम् ।

अनुवाद- उसके बाद उन्हें घर के बीच प्रवेश कराकर , चुपचाप दरवाजा बन्द करके डण्डे से सिर पर मारना आरम्भ कर दिया । मारे जाते हुए उनमें से कुछ तो मर गए , सिर फूटे हुए दूसरों ने चीत्कार करना प्रारम्भ कर दिया । इस बीच उस शोर को सुनकर कोतवाल ने कहा – अरे ! नगर के बीच में यह कोलाहल कैसा है ? तो जाओ ( पता करो ) ।

‘ उसके आदेश का पालन करने वाले वे सब भी उसके साथ तेजी से उसके घर गए और जैसे ही देखते हैं , वैसे ही ( उन्हें ) खून से लथपथ शरीर वाले ( इधर उधर ) भागते हुए नग्न ( क्षपणक ) दिखायी दिये तथा उनसे पूछा – ‘ अरे यह क्या है ?
‘ उन्होंने जैसा नाई के साथ घटनाक्रम घटा था ( सब कुछ ) कह दिया ।

“तैरपि स नापितो बद्धो हतशेषैः सह धर्माधिष्ठानं नीतः । तैनापित : पृष्ट ” भो , किमतेद् भवता कुकृत्यमनुष्ठितम् ? ” स आह- ” किं करोमि । मया श्रेष्ठिमणिभद्रगृहे दृष्ट एवं विधो व्यतिकरः । ‘ सोऽपि सर्व मणिभद्रवृत्तान्तं यथादृष्टमकथयत् ।

तत : श्रेष्ठिनमाहूय् ते भणितवन्त : – भो श्रेष्ठिन् ! किं त्वया कश्चित्क्षपणको व्यापादितः ? ततस्तेनाऽपि सर्वः क्षपणकवृत्तान्तस्तेषां निवेदितः । अथ तैरभिहितम् – ” अहो शूलमारोप्यतामसी दुष्टात्मा कुपरीक्षितकारी नापितः । ” तथाऽनुष्ठिते तैरभिहितम् –

अनुवाद – उन्होंने भी उस नाई की बाँधकर मरने से बचे हुए ( क्षणपकों ) के साथ न्यायालय में ले आए । उन्होंने नाई से पूछा – अरे ! तुमने यह कैसा कुकृत्य कर डाला । ‘ वह बोला – क्या करूं ? मैने सेठ मणिभद्र के घर पर इस प्रकार की घटना देखी थी । उसने भी मणिभद्र वृत्तान्त जैसा देखा था , कह दिया । तत्पश्चात् सेठ को बुलाकर उन्होंने कहा – ‘ अरे ! सेठ , क्या तुमने किसी क्षपणक को मारा है ? तब उसने भी सम्पूर्ण क्षपणकवृत्तान्त उन धर्माधिकारियों से कह दिया ।

पुनः उन्होंने कहा ओह ! इस दुष्टात्मा , बिना सोचे – समझे काम करने वाले नाई को शूली पर चढ़ा दो ।

वैसा करने पर उन ( धर्मधिकारियों ) ने कहा

” कुदृष्टं कुपरिज्ञातं कुश्रुतं कुपरीक्षितम् ।
तन्नरेण न कर्तव्यं , नापितेनात्र यत्कृतम् ।। “

अथवा साध्विदमुच्यते – अथवा ठीक ही कहा है कि –

“अपरीक्ष्य न कर्तव्यं कर्तव्यं सुपरीक्षितम् ।
पश्चाद्भवति सन्तापो ब्राह्मण्या नकुले यथा “॥१७ ॥

अनुवाद – बिना परीक्षा किए बिना भली भाँति समझे कोई कार्य नहीं करना चाहिए । भली प्रकार परीक्षा किया गया कार्य ही करना चाहिए । ( अन्यथा ) बाद में पश्चाताप होता है । जिस प्रकार ब्राह्मणी द्वारा नकुल के विषय में किया गया ) ।

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