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ASTHI DHATU

by

अस्थि धातु

उत्पत्ति

“मेदस्ततोऽस्थि प्रजायते ।।”( च ० चि ० 15/15 , अ ० हृ ० शा ० 3/63 )

मेद अस्थि को उत्पन्न करता है ।

• अस्थियों की संख्या-
दांत , दांतों के उलूखल और नखों सहित अस्थियां तीन सौ साठ होती हैं ।

अस्थियों के प्रकार तथा कार्य

ये अस्थियां पांच प्रकार की होती हैं तथा
( 1 ) कपालस्थियां
( 2 ) रुचक अस्थियां
( 3 ) तरुण अस्थियां ( cartilage )
( 4 ) वलय अस्थियां तथा
( 5 ) नलक अस्थियां ।

कपाल अस्थियां जानु , नितम्ब , अंस , गण्ड , तालु . , शंख तथा सिरा में होती हैं । कपाल अस्थियां चिपटी होती हैं । इनमें लम्बाई चौड़ाई अधिक तथा मोटाई कम होती है ।

रुचक अस्थियां दांत हैं । ये अस्थियां सौवर्चल नमक के समान श्वेत तथा भंगुर होती है इसलिए इन्हें अस्थियां कहते हैं वर्तमान वैज्ञानिक इन्हें अस्थियों में नहीं गिनते है ।

तरुण अस्थियां घाण नासिका ] , कर्ण , ग्रीवा तथा अक्षिकोष में होती हैं । ये दो प्रकार की होती है ।
[ 1 ] वे तरुण अस्थियां जो उचित आयु पर पूर्ण अस्थियां बन जाती है तथा
[ 2 ] ये जो जीवन भर तरुण [ cartilage ] रहती हैं । वलय अस्थियां पार्श्व , पृष्ठ तथा उर में होती है । ये विषम [ irregular ] तथा छोटी [ short ] अस्थियां है ।

शेष अस्थियां नलक संज्ञक है । नलक लम्बी अस्थियों को कहते हैं । शेष अस्थियां लम्बी होती हैं इसलिए नलक कहलाती है।

• अस्थियों के कार्य
[ 1 ] अस्थियां शरीर के रूप में [ shape ] को बनाये रखने में सहायक होती हैं ।,
[ 2 ] शरीर के प्रमुख अवयवों तथा मस्तिष्क , हृदय , फुफ्फुस आदि को रक्षण प्रदान करती हैं ।
[ 3 ] ये खनिजों के संग्रह स्थल हैं , विशेष रूप से कैल्शियम फॉस्फोरस के ।
[ 4 ] रक्त मज्जा , जो रक्त कोशिकाओं का उत्पत्ति स्थल है , अस्थियों के आश्रित रहती हैं ।
[ 5 ] जालिका अन्तःकला – कोशिकाओं [ reticularendothelial cells ] के मिलने का अस्थियां प्रमुख स्थान हैं।

• अस्थिसार पुरुष के लक्षण

अस्थिसार पुरुषों की एडी , गुल्फ ( गट्टा ) , जानु , अरत्नि ( मुष्टि ) , जत्रु , चिबुक , शिर और पर्व स्थूल होते हैं । अस्थियां , नख और दांत भी स्थूल होते हैं ।
अस्थिसार पुरुष बड़े उत्साही . क्रियाशील , क्लेश को सहन करने वाले , सारमय , स्थिरशरीरयुक्त तथा दीर्घायु होते हैं।

•अस्थिक्षय के लक्षण

अस्थिक्षय में केश , रोम , नख , दाढ़ी , मूछ के बाल एवं दांत सब गिर ( झड़ ) जाते हैं तथा थकावट शीघ्र हो जाया करती है । अस्थियों में पीड़ा एवं अस्थिसन्धियों में शिथिलता उत्पन्न हो जाती है।

• अस्थिवृद्धि के लक्षण

अस्थियों की ( सामान्य से अधिक ) वृद्धि में अस्थियों में तथा दाँतों में अनैसर्गिक वृद्धि होती है ।

• अस्थि के मल
“किट्ट केशलोमाऽस्थ्नोः ।”(च ० चि ० 15/18)

अस्थि के मल केश और लोम हैं ।

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