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Araka

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अर्क

• गुलाब , केवड़ा , वेदमुश्क आदि सुगन्धि पुष्प वाले द्रव्यों तथा खस , सौंफ , चन्दन , पोदीना , यवानी , अजमोदा , अनन्तमूल आदि सुगन्धित तैल युक्त द्रव्यों का अर्क बनाया जाता है । अर्क को Distilled water or sterilised water or aqua ( आसुत जल ) कहा जाता है ।

•  निर्माण विधि : -ताजे हरे सुगन्धित द्रव्य को यवकुट कर अथवा शुष्क द्रव्य हो तो यवकुट चूर्ण करके दश गुना जल में रात्रि में भिगो दें और प्रातःकाल अर्कयन्त्र ( भभका यन्त्र- Distillation apparatus ) में डालकर यन्त्र के पात्रों की संधि को कपड़मिट्टी द्वारा सन्धिबन्धन कर दें ।

 तब भभका यन्त्र को चूल्हे पर चढ़ा दे । भभके के ऊपरी पात्र में बने आलवाल में शीतल जल भर दे और यन्त्र की नली के नीचे काँच की बोतल रखें । आलवाल में भरे जल के गर्म हो जाने पर निकालकर शीतल जल भरते रहें ।

 औषध द्रव्य का सुगन्धि तैल एवं उड़नशील कार्यकारी तत्त्व ( कार्मुक अंश ) वाष्पीभूत होकर ऊपर उठता है और आलवाल में भरे हुए शीतल जल के कारण ठण्डा होकर द्रवीभूत होता है और नली द्वारा बूंद – बूंद निकलकर काँच की शीशी में इकट्ठा होता रहता है ।

जब एक शीशी भर जाये तो दूसरी शीशी लगा दें । अंत में स्वच्छ बारीक वस्त्र से छानकर बोतलों में भरकर कार्क लगाकर पैक कर दें ।

• सावधानियाँ-

1. भभका का पात्र ताम्र निर्मित एवं अन्दर से कलई किया हुआ होना चाहिए , अन्यथा अर्क में धातुजन्य रासायनिक विकृति या अवगुण आ सकता है ।

2. अर्क निकालते समय तीव्राग्नि का प्रयोग न करें , अन्यथा पात्र स्थित जल उबलकर क्वाथ जैसा ही अर्क निकलेगा । अग्नि की अधिकता से जल शीघ्र ही सूख जाता है और अर्क वाले द्रव्य को जला देती है । परिणामतः जो भी अर्क निकलेगा , वह जला हुआ स्वाद एवं गन्ध वाला होगा ।

3. अर्क हेतु द्रव्य के साथ जितना जल डाला गया है , उसका आधा या तीन चौथाई अर्क निकालना चाहिए । इसके बाद अर्क में जला हुआ भाग आने लगता है।

 4. यदि किसी अर्क में दुर्गन्ध आती हो तो उसे हींग , जीरक , मेथी , राई का चूर्ण , घी में मिलाकर नई हाण्डी में रखकर कई बार धूप देने से अर्क की दुर्गन्ध दूर होकर सुगन्ध उत्पन्न हो जाती है और अर्क जाठराग्नि का वर्धक भी हो जाता है ।

• अर्क निकालने के लिए क्रमशः छः प्रकार की अग्नि का प्रयोग करना चाहिए ।

1. धूमाग्नि

2. मन्दाग्नि

3. दीपाग्नि

4. मध्यमाग्नि

5. खराग्नि और

6 . भटाग्नि ।

1. धूमाग्नि : -जिस अग्नि में बिना ज्वाला बहुत ऊँचाई तक धुंआ उड़े , उसे धूमाग्नि कहते हैं ।

2. दीपाग्निः – पूर्वोक्त धूमाग्नि को दुगुना या चौगुना करने से दीपक के समान ज्वाला निकलती है , उसे दीपाग्नि कहते हैं ।

3. मन्दाग्निः – दीपाग्नि को चौगुना जलाने पर मन्दाग्नि कहलाती है ।

4. मध्यमाग्निः – दीपाग्नि तथा मन्दाग्नि के मध्य की अग्नि को मध्यमाग्नि कहते हैं ।

5. खराग्निः – मध्यमाग्नि से पाँच गुना अधिक अग्नि को खराग्नि कहते हैं । इस अग्नि का प्रयोग सभी कार्यों में होता है ।

6. भटाग्नि : -जिस अग्नि की ज्वाला पात्र के चारों तरफ मस्तकपर्यन्त फैलती हुई दिखाई दे , उसे भटाग्नि कहते हैं ।

यवान्यर्क : – ( A.F.L. Part Ist , IInd Revised English edition )

घटक द्रव्य :

1. यवानी ( फ . ) -1 भाग

2. निषेकार्थ जल- 2 भाग

3. अर्क निर्माणार्थ जल- 4 भाग

मात्रा : -10 से 25 मि.ली.

गुणः – पाचक , जाठराग्निदीपक और रुचिकारक है , त्रिशूल ( कटिशूल ) को दूर करता है ।

 गुलाब अर्क 🙁 वृद्ध वैद्य परम्परा )

 घटक द्रव्य

1. गुलाब पुष्प 1 भाग

 2. जल 10 भाग

मात्रा : -10 से 25 मि.ली. ( आभ्यन्तर प्रयोग ) , बाह्यप्रयोग हेतु यथावश्यक

गुण : – गुलाब का अर्क सर , शीत और कषाय रस युक्त होता है । श्रम , दाह , वमन , तृषा , पित्तरोग और मुखरोग नाशक है ।

मिश्रेयार्क : – ( A.E.I. Part Ist , IInd Revised English edition )

 घटक द्रव्य

1. मिश्रेया ( सोया )-1 कि.ग्रा

 2. जल- 7 लीटर

3. निष्कासित अर्क की मात्रा- 5 लीटर

 मात्रा :- : -10 से 25 मि.ली.

 गुणः – मन्दाग्नि , योनिशूल तथा कृमिरोगों को नष्ट करता है । 

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