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APTOPADESH

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आप्तोपदेश

जो विद्वान एवं महापुरुष रागद्वेष से दूर रहकर यथार्थ का निरूपण करते हैं उन्हें आप्त पुरुष कहा जाता है । इनके वचनों को आप्त प्रमाण माना जाता है ।

आप्तोपदेश के लक्षण व स्वरूप

“तत्र आप्तोपदेश नाम आप्त वचनम्”

आप्त पुरुष तर्क से रहित निश्चित ज्ञान वाले होते हैं वे स्मरण शक्ति से सम्पन्न तथा कार्य अकार्य के विभाग को जानने वाले होते हैं । वे किसी भी प्राणी के प्रति प्रीतियां द्वेष से रहित होते हैं । इन गुणों से युक्त होने के कारण इनके वचनों को प्रमाण माना जाता है ।

आप्त के लक्षण

जो तप और ज्ञान के बल से रज और तम दोषों से रहित हैं । जिनका ज्ञान निर्मल व बिना बाधा के तीनों कालों में रहता हो ।
जिनके वचन संशय रहित हो रज तम से रहित होने के कारण वे सत्य ही बोलते है असत्य नहीं ।
वे स्मरण शक्ति से सम्पन्न तथा कार्य अकार्य के विभाग को जानने वाले होते हैं ।
वे किसी भी प्राणी के प्रति राग या द्वेष से रहित होते हैं ।

शब्द प्रमाण

तर्कसंग्रह में आप्तोपदेश को शब्द कहा गया है । शब्द प्रमाण का समर्थन सांख्य , योग , मीमांसा तथा वेदान्त सभी करते हैं । परन्तु शब्द के लक्षण के बारे में आपस में मतभेद है ।

ये शब्द वेदवाक्यों के अनुकूल अन्य शास्त्र भी जो यथार्थ ज्ञान से युक्त है उन्हें शब्द प्रमाण कहते हैं ।

इस प्रमाण के दो प्रकार है –
1.लौकिक शब्द प्रमाण

  1. वैदिक शब्द प्रमाण

1.लौकिक शब्द प्रमाण

वेदवाक्यों के अनुकूल अन्य शास्त्र भी जो मनुष्य द्वारा रचित है जो यथार्थ ज्ञान से युक्त हैं उन्हें शब्द प्रमाण के रूप में माना जाता है ।

2.वैदिक शब्द प्रमाण

वैदिक शब्द श्रुति के वाक्य होते है पद के समूह को वाक्य कहते है । पद शक्ति से सम्पन्न होता है । शक्ति का तात्पर्य वेदवाक्यों द्वारा प्राप्त उस संकेत से है जिससे इस पद का सही अर्थ समझा जाए ।

चरक के अनुसार शब्द के लक्षण व भेद

वर्गों के समूह को शब्द कहा जाता है ।
शब्द के चार भेद माने गए हैं ।

1 दृष्टार्थ – वे शब्द जिन्हे व्यवहार में देखा या अनुभव किया जा सकता है । उन्हे दृष्टार्थ शब्द कहते हैं । जैसे विविध हेतु दोषों को कुपित करते है ।

  1. अदृष्टार्थ – शब्द जिन्हे व्यवहार में देखा या प्रत्यक्ष नही किया जा सकता जैसे स्वर्ग मोक्ष परन्तु उन्हे यथार्थ मान कर स्वीकार किया जाता है ।
  2. सत्य – यथार्थ शब्द सत्य कहे जाते हैं । जैसे शास्त्रोपदेश ।
  3. अनृत- जो सत्य के विपरीत हो जैसे विष खाने से मृत्यु नहीं हो सकती । पृथ्वी चपटी है ।

आचार्य चरक ने शब्द के चार भेद किए है उन्होने शब्द को प्रमाण नहीं माना आप्तोपदेश को प्रमाण माना है ।

शब्द के लक्षण व शब्द के प्रकार

शब्द आकाश का गुण है । उसका श्रोत्रेन्द्रिय द्वारा ग्रहण होता है । यह क्षणिक होता है । कार्यकारण दोनो का विरोधी होता है।
ये दो प्रकार के है 1.वर्णात्मक जो अ आ आदि शब्द है ये वर्णात्मक हैं ।
2.ध्वन्यात्मक – शंखादि के जो शब्द हैं उन्हे ध्वन्यात्मक कहते हैं ।

वाक्य

पदों का समूह वाक्य है । यदि पदों का उचित बोध न हो तो वाक्य का सही अर्थ नही निकलता । आकांक्षा योग्यता सन्निधि से युक्त पदों का समूह वाक्य कहलाता है ।

वाक्य दो प्रकार के हैं .
1 ) वैदिक
2 ) लौकिक

वैदिक वाक्य चार प्रकार के है ।
1 ) श्रुति
2 ) स्मृति
3 ) इतिहास
4 ) पुराण

वाक्यार्थ ज्ञान के चार कारण
1 ) आकांक्षा
2 ) योग्यता
3 ) सन्निधि
4 ) तात्पर्य “

1)आकांक्षा
वाक्यार्थ ज्ञान हेतु पदों को बोलते लिखते समय उसके द्वारा होने वाली इच्छा पूर्ति होनी चाहिए । वाक्य में प्रयोग किए गए पद एक दूसरे की सहायता को प्रकट करते हैं ।
जैसे दिनेश खेलता है । यदि केवल दिनेश कह कर रूक जाए तो आकांक्षा बनी रहती है कि दिनेश क्या कर रहा है । इसी तरह खेलता है इतना कहने से भी आकांक्षा रहती है कौन खेलता है । एक पद के बाद अन्य पद की इच्छा बनी रहना आकांक्षा है । वाक्य से आकांक्षा पूर्ति होनी चाहिए ।

2)योग्यता
प्रत्येक पद में अर्थ प्रकट करने की योग्यता रहती है । उसके बिना वाक्यार्थ बोध ठीक नहीं होता । जैसे कान से खाता है । यह वाक्य योग्य नहीं है । मुख से खाता है कान से सुनता है । इन वाक्यों में योग्यता है । अग्नि से सींचता है यह अयोग्य वाक्य है परन्तु जल से सींचता है । यह योग्य वाक्य है । आँरव से सुनता है , अयोग्य वाक्य है ।

3)सन्निधि
दो या दो से अधिक पदों का बिना अन्तराल प्रयोग एवं अर्थवत् शब्दों का निरन्तर बोध सन्निधि कहलाता है । वाक्यों के पदों में समीपता होना आवश्यक है ।
जैसे सुरिन्द्र भोजन खाता है । यहां यदि इन शब्दों को घण्टे घण्टे के बाद बोला जाए तो अर्थ बोध नही होता । लिखते या बोलते समय एक निश्चित व्यवधान होने पर ही सही अर्थ समझ आता है ।

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