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ANYASWAROOP VIGYANIYA

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अन्यस्वरूपविज्ञानीय – भाग 1

• शालि चावलों के भेद-

( १ ) रक्तशालि , ( २ ) महाशालि , ( ३ ) कलमशालि , ( तूर्णकशालि , ( ५ ) शकुनाहत शालि , ( ६ ) सारामुख शालि , ( ७ ) दीर्घशूकशालि , ( ८ ) रोध्रशूक शालि , ( ९ ) सुगन्धक शालि , ( १० ) पुण्ड्रशालि , ( ११ ) पाण्डु – शालि , ( १२ ) पुण्डरीक शालि , ( १३ ) प्रमोदशालि , ( १४ ) गौरशालि , ( १५ ) शारिव – शालि , ( १६ ) काञ्चनशालि , ( १७ ) महिषशालि , ( १८ ) शूक शालि , ( १ ९ ) दूषक – शालि , ( २० ) कुसुमाण्डकशालि , ( २१ ) लाङ्गलशालि , ( २२ ) लोहवालशालि , ( २३ ) कर्दमशालि , ( २४ ) शीतभीरुकशालि , ( २५ ) पतङ्गशालि , ( २६ ) तपनीयशालि और इनके अतिरिक्त अन्य श्रेष्ठ शालि चावल सामान्यतः रस और विपाक में मधुर , स्निग्ध ( Oily ) , वृष्य ( बाजीकर – Aphrodisiac ) , मल को बांधने और अल्प मात्रा में प्रवृत्त करने वाले , इनका अनुरस – कषाय , पथ्य ( हितकारक ) , लघु ( Light ) , मूत्रल ( मूत्र कराने वाले- Diuretic ) और शीतवीर्य के होते हैं ।

• शूकधान्य वर्ग-

इसमें शूक अर्थात् कांटा या बाल लगा रहता है । जो धान्य हेमन्त ( मार्गशीर्ष पौष – विसर्गकाल- श्रेष्ठ बल ) ऋतु में होते हैं और बिना कूटे ही स्वच्छ निकलते हैं इन्हें शालि धान्य कहते हैं । शिम्बी धान्य- वह है जो फली में से निकलता है ।

शूक धान्यों में शालि चावल श्रेष्ठ है , इसलिये पहले इसी का वर्णन किया गया है।

• रक्तशालि चावल के गुण-

शूकज ( ट्रॅण – कांटा ) धान्य में रक्तशालि चावल श्रेष्ठ ( वर ) है , यह तृष्णा ( प्यास ) और त्रिदोष ( वात – पित्त – कफ ) को नष्ट करने वाला होता है । 

• यवकादि के गुण-

यवक , हायनक , पांशु , वाप्य और नैषधक आदि रस में स्वादु ( मधुर ) , उष्णवीर्य , गुरु , स्निग्ध , विपाक में अम्ल , श्लेष्मकारक , पित्तकारक , मूत्र और पुरीष होते हैं , ये सभी पूर्व – पूर्व निन्दित होते हैं ।

• साठी ( षष्टिक- Eng : – Rice , L.N.- Oryza sativa Linn . ) के गुण

• पष्टिक ब्रीही चावल के गुण-

 ब्रीही धान्यों में षष्टिक चावल श्रेष्ठ होता है । यह स्निग्ध , ग्राही ( स्तम्भन कारक ) , लघु , रस में मधुर , त्रिदोषनाशक , स्थिर ( शरीर में अधिक समय तक रहने वाला ) और शीतवीर्य होता है । यह गौर ( श्वेत ) और असित ( कृष्ण ) गौर दो प्रकार का होता है , इनमें असित ( कृष्ण ) गौर ( श्वेत ) की अपेक्षा गौर श्रेष्ठ होता है ।

• ब्रीही धान्य के गुण –

निम्न ब्रीही धान्य षष्टिक धान्य की अपेक्षा हीन गुण वाले होते हैं- १. महाब्रीही , २. कृष्ण ब्रीही , ३. जतूमुख , ४. कुक्कुटाण्डक , ५. लावाक्ष , ६. पारावतक , ७. शूकर , ८. वरक , ९ . उद्दालक , १०. उज्वाल , ११. चीन , १२. शारद , १३. दर्दुर , १४. गन्धन , और १५. कुरुविन्द ये अल्प गुण वाले होते हैं ।

• तृणधान्य के गुण-

कङ्गु ( L.N.- Setaria italica beauv ) , कोद्रव ( कोदो ) , नीवार ( तिन्नी का चावल ) और श्यामाक ( सांवा ) आदि तृणधान्य ( तुच्छधान्य ) शीतल , लघु , वातकारक , लेखन ( कृश ) करने वाला और कफ – पित्तनाशक होता है । 

• प्रियंगु ( L.N.- Callicarpa macrophylla vahl . ) धान्य टूटे अस्थि ( Fracture ) को जोड़ने वाला , बृंहण कारक और गुरु होता है ।

• कोदो ( L.N.- Paspalum scrobiculatum Linn . ) के गुण-

यह अत्यन्त ग्राही , स्पर्श में शीतल और विषनाशक होता है ।

• जौ ( Eng.- Barley , L.N.- Hordeum vulgare Linn . ) के गुण-

यह रूक्ष , शीतल , गुरु मधुर ( स्वादु ) , सर ( भेदक ) , मल और वातकारक होता है । यह वृष्य ( शुक्रकारक ) , दृढ़ता उत्पन्न करने वाला , मूत्र – मेद – पित्त और कफ को जीतने अर्थात् नष्ट करने वाला होता है । पीनस ( Catarrh ) , श्वास ( Dyspnoca ) , कास ( Cough ) , उरुस्तम्भ , कण्ठ ( Throat ) और त्वचा के रोगों को नष्ट करता है । अनुयव ( पतले यव ) यव से कम गुण वाले होते हैं ।

• बांस के यव ( चावल ) के गुण-

यह रूक्ष और उष्ण होता है ।

• गेहूँ ( Eng.- Wheat , L.N.- Triticum sativum Lam . ) के गुण- यह वृष्य ( बाजीकरण- Aphrodisiac ) , शीत वीर्य , गुरु , स्निग्ध , जीवनदायक , वात – पित्तनाशक , टूटे – फूटे अंगों को जोड़ने वाला , मधुर स्थिरता उत्पन्न करने वाला और अनुलोमक होता है ।

• नन्दीमुखी गेहूं के गुण-

यह शरीर के लिये हित – कारक , शीतवीर्य , कषाय , मधुर और लघु होता है ।

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