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ANYASWAROOP VIGYANIY

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अन्यस्वरूपविज्ञानीय – भाग 3

• कृतान्न ( पक्वान्न ) वर्ग 

मण्ड , पेया , विलेपी और ओदन ( भात – पका चावल ) पूर्वोक्त क्रमानुसार लघु ( Easily digestable ) और शिव ( कल्याणकारक ) होते हैं । अर्थात् मण्ड सबसे अधिक लघु इससे कम पेया , इससे कम विलेपी और सबसे कम भात लघु होता है मण्ड वायु का अनुलोमक है । तृष्णा ( प्यास – Thirst ) , ग्लानि ( Depresion ) और शेष दोषों को नष्ट करने वाला , पाचक ( Digestive ) , धातुओं को समान करने वाला , स्रोतों को मृदु बनाने वाला , स्वेद ( पसीना ) लाने वाला और जठराग्नि को ( अनल ) को बढ़ाने ( उद्दीप्त ) करने वाला होता है ।

• चावल को चौदह गुने पानी में पकाते हैं , इसके बाद इसका शेष जल छान लेते हैं , यही ‘ मण्ड ‘ है ।

• अन्न को 14 गुने जल में पकाने के बाद जब अन्न पक जाये और अत्यन्त मात्रा में द्रव शेष रह जाये तो इसे ‘ पेया ‘ कहते हैं । इसे ही थोड़ा गाढ़ा कर देने पर इसे ‘ यूष ‘ कहते हैं ।

• जब चावल को चौगुने जल में पकाते हैं और यह पकते -२ लिपटने वाली हो जाती है तब इसे ‘ विलेपी ‘ कहते हैं ।

• पेया के गुण-

भूख , प्यास , ग्लानि ( Depression ) , दुर्बलता , कुक्षि ( Abdominal ) रोग और ज्वर ( Fever ) को नष्ट करने वाली है । यह मल का अनुलोमन करने ( अपने उचित मार्ग से निकालने ) वाली , पथ्य ( हितकारी ) , दीपन ( जठराग्नि को तीव्र करने वाली ) और पाचन ( Digestive ) करने वाली है ।

• विलेपी के गुण-

यह ग्राही ( रोकने वाली ) , हृदय के लिये उत्तम , तृष्णा ( Thirst ) को नष्ट करने वाली , दीपन ( जठराग्नि को तीव्र करने वाली ) , व्रण ( Abscess ) , नेत्र रोग , शोधन ( पंचकर्म ) के बाद , दुर्बल और स्नेह का पान करने वालों के लिये हितकारक है ।

• ओदन ( भात ) के गुण-

अच्छी प्रकार से धुला हुआ ( सुधौत ) , अच्छी प्रकार से निथारा गया ( जिसका मण्ड निकाला गया हो- प्रसुत ) , अच्छी प्रकार से पक गया ( स्विन्न ) हो और गरम हो वह ओदन ( भात ) लघु ( Easily digestable ) होता है । जो चावल ( तण्डुल ) पानी के स्थान पर आग्नेय ( उष्ण द्रव्य – चित्रक , मरिच आदि ) औषध द्रव्यों के क्वाथ ( Decoction ) में पकाया गया हो वह भी लघु होता है , इसी प्रकार भुने ( भृष्ट ) चावलों का भात भी लघु होता है ।

इसके विपरीत ( जो धुला न हो , जिसका मण्ड न निकाला गया हो या ठंडा हो गया हो ) पकाया गया ओदन , या क्षीर या मांस रस में पका चावल गुरु ( भारी ) होता है । इसी प्रकार द्रव्य , क्रिया संयोग और मान ( Parameter ) आदि के अनुसार सभी पेया या अन्नादि के गुणों को समझना चाहिये ।

• रस का गुण-

यह बृंहणकारक ( पुष्टिकारक ) , प्रीणन ( तृप्ति ) करने वाला , वृष्य ( Aphrodisiac ) , आंखों के लिये उत्तम और व्रण ( Abscess ) नाशक होता है ।

• मूंग ( Eng . – Green gram , L.N.- Phaseolus aureus Roxb . ) के यूष का गुण-

संशोधन ( वमनादि पंचकर्म के द्वारा शुद्ध हुये व्यक्ति में , व्रण ( Abscess ) को रोगी , कण्ठ ( Throat ) और नेत्र रोगी में इसका सेवन हितकारक होता है ।

• कुलथी ( Eng.- Horse – gram , L.N.- Dolichos biflorus Linn . ) के यूष का गुण-

यह वात का अनुलोमन करने वाला , गुल्म ( Tumour ) , तूनी और प्रतूनी ( वातज व्याधियाँ ) को नष्ट करने वाला होता है ।

• तिल आदि के गुण-

 तिल की खली ( पिण्याक ) से बनाये गये पदार्थ , सूखा शाक ( Vegetable ) , अंकुरित धान्य ( विरुढक – Sprouted ) और शाण्डाकी वटक दृष्टि ( Vision ) को नष्ट करने वाले , दोषकारक , ग्लानि ( Depression ) कारक और गुरु ( भारी ) होते हैं । 

• रसाला ( श्रीखण्ड ) के गुण-

यह बृंहणकारक , वृष्य ( बाजीकरण- Aphrodisiac ) , स्निग्ध , बलकारक और रुचि उत्पन्न करने वाला है ।

• पानक ( पन्ना ) के गुण-

यह श्रम ( थकान- Fatigue ) . क्षुधा ( भूख ) , तूट ( प्यास- Thirst ) और क्लम ( बिना परिश्रम के थकान होना ) को नष्ट करने वाला , तृप्तिकारक , गुरु , विष्टभी ( स्रोतोवरोधक ) , मूत्र कराने वाला और हृदय के लिये लाभकारक होता है तथा इसका गुण अपने द्रव्य के गुण के अनुसार होता है जिससे यह पानक बनाया जाता है ।

• लाजा ( खील – घान का लावा ) के गुण-

यह तृट् ( प्यास – Thirst ) , छर्दी ( वमन – Vomiting ) , अतीसार ( Diarrhoea ) . प्रमेह , मेद और कफ को नष्ट करता है । कास ( खांसी – Cough ) और पित्त को शान्त करता है दीपक ( जाठराग्नि को तीव्र करने वाला ) , लघु और शीतल होता है ।

• पृथुक ( चूड़ा ) का गुण-

यह गुरु , बलकारक , कफकारक और विष्टम्भिकारक ( स्रोतसों में अवरोध करने वाला ) होता है ।

• घाना ( भुना मक्का , जौ , ज्वार आदि ) के गुण-

यह विष्टम्भिकारक ( स्रोतसों में अवरोध करने वाला ) , रुक्ष , तर्पण करने वाला , लेखन ( कर्षण ) करने वाला और गुरु होता है ।

• सत्तू के गुण-

यह लघु ( हल्का ) , भूख , प्यास , श्रम ( थकान – Fatigue ) , नेत्र रोग ( आमय ) और व्रण ( Abscess ) को नष्ट करने वाला है । इसे जल में घोलकर पीने से यह शीघ्र ( सद्यः ) ही सन्तर्पण करता है और बल प्रदान करता है । सत्तू खाने के समय पानी नहीं पीना चाहिये , दिन में दो बार और रात्रि में सत्तू का सेवन नहीं करना चाहिये तथा अकेले केवल सत्तू नहीं खाना ( साथ में गुड़ , नमक कुछ लेना ) चाहिये । भोजन के बाद , सत्तू के पिण्ड को दांत से काटकर और बहुत मात्रा में सत्तू नहीं खाना चाहिये ।

• पिण्याक ( तिल का कल्क – Paste ) के गुण-

यह ग्लानि ( Depression ) उत्पन्न करने वाला , रूक्ष , विष्टम्भिकारक ( स्रोतसों में अवरोध – Obstruction उत्पन्न करने वाला ) और दृष्टि ( Vision ) को नष्ट करने वाला होता है । 

• वेसवार के गुण- यह गुरु , स्निग्ध , बल और उपचय ( पुष्टि ) को बढ़ाने वाला होता है।

• मूंग ( Eng.- Green gram , L.N.- Dolichos biflorus Linn . ) आदि से निर्मित वेशवार के गुण-

यह गुरु और बनाये गये द्रव्य के समान गुणवाला होता हैं।

• अपूप ( खाद्य द्रव्य ) – कुकूल , खर्पर , भ्राष्ट्र , कन्दु और अंगारों पर एक ही योनि ( एक ही धान्य ) से बने खाद्य द्रव्य ( अपूप ) उत्तरोत्तर लघु होते हैं ।

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