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ANYASVAROOP VIGYANIYA

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अन्यस्वरूपविज्ञानीय – भाग 7

• लवण ( सम्पूर्ण ) –

विष्यन्दि ( पानी बहाने वाला ) , सूक्ष्म ( शरीर के सूक्ष्म रोमकूपों में भी प्रवेश कर जाता है ) , मल प्रवृत्त ( सूष्टमलं ) कराने वाला , मृदु , वातनाशक , पकानेवाला ( पाकि ) , तीक्ष्ण , उष्ण , रुचिकारक , कफ और पित्त को बढ़ाने वाला होता है ।

• सैन्धव लवण-

 थोड़ा स्वादु ( मधुर ) , वृष्य ( बलवर्धक- शुक्रवर्द्धक ) , हृद्य ( हदय के लिये लाभकारक ) , त्रिदोषनाशक , लघु , थोड़ा उष्ण , दृश ( नेत्रों ) के लिये पथ्य , अविदाही ( जलन न करने वाला ) और अग्नि ( जठराग्नि ) को दीप्त ( Appetiser ) करने वाला होता है ।

• सौवर्चल लवण-

 लघु , हृद्य ( हृदय के लिये गुणकारी ) , सुगन्धकारी , शुद्ध उद्गार को लाने वाला , विपाक में कटु , विबन्ध ( मलावरोध ) को नष्ट करने वाला , दीपनीय ( जठराग्नि को तीव्र करने वाला ) और रूचिकारक होता है ।

•  विड लवण-

उर्ध्व और अधो ( मुख और गुदा ) दोनों भागों से कफ और वात का अनुलोमन ( अपक्व मलों को पकाकर और वायु के बन्ध को भेदकर नीचे अर्थात् गुदा मार्ग से बाहर कर देता है ) करने वाला और अग्नि ( जठराग्नि ) को दीप्त करने वाला है यह विबन्ध ( मलावरोध ) , अनाह ‘ ( कुपित वायु कुक्षि में स्थिर हो जाती है – वायु न उपर जाती है और न नीचे ) , विष्टम्भ ( मल पुरीष का अवरोध ) , शूल और गुरुता का नाश करता है ।

• सामुद्र लवण- विपाक में मधुर , गुरु और कफ वर्द्धक होता है ।

• औद्भिद लवण- थोड़ा तिक्त , कटु , क्षार , तीक्ष्ण , और उत्क्लेद ( Becoming Wet ) करने वाला है । 

• कृष्ण लवण-

कृष्ण लवण में सौवर्चल लवण के गुण ही हैं , किन्तु सुगन्धि नहीं है ।

• रोमक लवण-

पांसु ( धूल ) से बनाया हुआ , लघु , थोड़ा क्षारीय , कफवर्द्धक और गुरु होता है ।

• लवणों के प्रयोग में सैन्धवादि लवण का प्रयोग करना चाहिये।

• यवक्षार –

गुल्म ( Tumour ) नाशक , हृदय – ग्रहणी ( Sprue ) – पाण्डु ( रक्ताल्पता- Anaemia ) – प्लीहा – आनाह ( आमाशय में वायु का स्थित हो जाना जिससे वह उपर – नीचे कहीं से बाहर नहीं निकल सके ) , गले के रोग , श्वास ( Dyspnoea ) , अर्श ( Pile ) , कफ और कास ( खांसी Cough ) रोग को शान्त करता है ।

• हींग Eng.- Asafoetida , L.N.- Ferula narthey Boiss ) के गुण-

वायु , कफ , आनाह ( Tympanitis ) और शूल ( Abdominal pain ) को नष्ट करने वाला , पित्त को कुपित करने वाला , विपाक और रस में कटु , रुचि उत्पन्न करने वाला , जठराग्नि को तीव्र करने वाला , भोजन को पचाने वाला और होता है ।

• हरड़ ( पथ्या Eng.- Chebulic myrobalan , L.N.- Terminalia chebula Retz . ) –

कषाय रस प्रधान , विपाक में मधुर , रूक्ष और पाचों रसों- ( मधुर , अम्ल , कटु , तिक्त , कषाय ) से युक्त होता है इसमें केवल लवण रस नहीं होता है ( विलवणा ) , लघु , दीपन ( जठराग्नि को तीव्र करने वाली Appetiser ) , पाचनी ( आहार का पाचन करने वाली Digestive ) , मेध्य ( बुद्धि को बढ़ाने वाली ) , वयस ( आयु वर्द्धक ) और आयु को स्थिर ( वृद्धावस्था समय से पहले नहीं आता है ) करने में श्रेष्ठ है , उष्णवीर्य , सर ( फैलनेवाली ) , आयुष्य ( आयु को बढ़ाने वाली ) , बुद्धि और इन्द्रियों ( ज्ञानेद्रिय -५ , कमेंन्द्रिय -५ ) को बल प्रदान करने वाली , कुष्ठ ( Skin Disease ) , विवर्णता ( वर्ण का विकृत होना ) , वैस्वर ( इसमें रोगी का स्वर – रूक्ष , तीक्ष्ण , मन्द या कष्ट के साथ निकलता है ) हैं।

• आमलकी ( Eng Emblic myrobalan . L.N.- Emblica officinalis Gaerin . ) –

आंवला भी हरीतकी के समान ही गुणकारी है । यह वीर्य में शीत और अम्ल रस से युक्त होने के कारण श्रेष्ठ पित्त और कफ शामक है ।

• अक्ष ( विभीतक , Eng.- Bellirie myrobalan , L.N.- Terminalia Bellirica Roxb . ) के गुण-

यह विपाक में कटु , वीर्य में शीत , केश के लिये हितकारी और गुण में हरड़ तथा आमलकी के समान होता है ।

• त्रिफला- ये ( हरीतकी Eng.- Chebulic myrobalan . L.N.- Terminalia chebula Retz , विभीतक Eng.- Belliric myrobalan , L.N.- Terminalia bellirica Roxb . और आमलकी Eng.- Emblic myrobalan , L.N.- Emblica officinalis Gaertn ) त्रिफला रसायनों ( Rejuvinators ) में श्रेष्ठ है , यह नेत्र रोग नाशक , व्रण का रोपण ( Healing ) करने वाला , त्वचा के रोग – क्लेद – मेद – मेह ( बहुमूत्रता ) , कफ और रक्तज रोगों को नष्ट करता है ।

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