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ANUPAN

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अनुपान

निरुक्ति :

‘ अनु – पश्चात् सह वा पीयते इति अनुपानम् ।। “

अर्थात् औषध एवं आहार के साथ अथवा उसके सेवन के पश्चात् जिस द्रव पदार्थ का पान किया जाता है , उसको अनुपान कहते हैं ।

अनुपान परिभाषा :

‘यत्किञ्चिदौषधं वैद्यैर्देयं रोगानुपानतः ।

तत्तद्गुणकरं ज्ञेयमनुपान बलादिहः ।।” ( यो . र . रसायन )

अर्थात् चिकित्सक द्वारा रोगोक्त अनुपान के साथ प्रयोग करने पर औषधियाँ अत्यधिक गुणवान् हो जाती है । अतः इसे अनुपान कहते हैं ।

अनुपान प्रयोजन :

“यथा तैलं जले क्षिप्तं क्षणेनैव प्रसर्पति ।

अनुपान बलादने तथा सर्पति भेषजम् ।। “( शा . सं . म . ख . 6/5 )

अर्थात् जिस प्रकार जल के ऊपर तैल की बूंद डालने पर अतिशीघ्र फैल जाती है । उसी प्रकार औषधि का सेवन अनुपान के साथ करने पर शीघ्रता से शरीर में फैलकर बल प्रदान करती है।

अनुपान की उपयोगिता

प्राचीन आचार्यों के अनुसार सम्यक् रूप से अनुपान का सेवन करने से औषध एवं आहार का पाचन होकर मनुष्य तृप्त हो जाता है । जिससे बल एवं आयु की वृद्धि हो जाती है ।

अनुपान से तृप्ति , शारीरिक धातुओं का प्रीणन , ऊर्जा की प्राप्ति , बृंहण , शरीर रक्षक , खाये हुए अन्नादि पदार्थ को आमाशय से नीचे धकेलना , अन्नसंघात , भोजन में मृदुता , क्लेदन , पचाना , भोजन पचने के पश्चात् शीघ्र चारों तरफ फैलने योग्य बनाना , रोचन , वृष्य , श्रमक्लमहरता , सुखदायक , दोषशामक , दीपन , पिपासानाशक , वर्ण्य और अङ्गों को दृढ़ करने के कर्मों से अनुपान का सेवन करने से अत्यन्त लाभ होता है ।

श्रेष्ठ अनुपानः

“यदाहारगुणैः पानं विपरीतं तदिष्यते ।

 अन्नानुपानं धातूनां दृष्टं यन्न विरोधि च ।।” ( च . सू . 27/319 )

अर्थात् जो द्रव पदार्थ औषध एवं आहार द्रव्यों के गुणों से विपरीत गुण वाला हो , किन्तु वह धातुओं का विरोधी नहीं हो , वह औषध एवं आहार द्रव्यों का उचित अनुपान होता है ।

अनुपान मात्रा :

“चूर्णावलेहगुटिकाकल्कानामनुपानकम् ।

वातपित्तकफातङ्के त्रिद्वयेकपलमाहरेत् ।।” ( शा . सं . म . ख . 6/4 )

अर्थात् चूर्ण , अवलेह , गुटिका और कल्कों का अनुपान वातरोग में तीन पल , पित्त रोग में दो पल एवं कफ रोग में एक पल होना चाहिए

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