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ANUMAN PRAMAN

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अनुमान प्रमाण

निरूक्ति – “ अनु ‘ ‘ और ‘ मान ‘ ‘ दो शब्दों से अनुमान शब्द का निर्माण होता है । अनु का अर्थ है पश्चात् और अर्थ का ज्ञान ।

“ अनुपूर्व हेतुं दृष्ट्वा पश्चान्मीयते इत्यनुमानम् । ‘

प्रथम कारण को देखकर पश्चात् उसके आधार पर परोक्ष स्थित विषय का ज्ञान प्राप्त किया जाना अनुमान प्रमाण है । “

लक्षण को देखने के बाद , जिसमें वह लक्षण उपस्थित है , उसका ज्ञान जिस साधन से होता है उसे अनुमान कहते हैं ‘

“अनु पश्चात् मीयते ज्ञायते इति अनुमानम् ‘”

अनुमान के भेद

तर्क संग्रहकार ने अनुमान के भेद बताये हैं –
१ . स्वार्थानुमान और
२. परार्थानुमान ।

1). स्वार्थानुमान -अपनी अनुमिति ( अनुमान का निष्कर्ष ) का हेतु ‘ स्वार्थानुमान ‘ है , अर्थात् स्वयं के लिये या अपने विषय के ज्ञान प्राप्ति के लिये जो अनुमान किया जाता है वही ‘ स्वार्थानुमान ‘ है या स्वयं के समझने के लिये जो अनुमान किया जाता है वही स्वार्थानुमान है ।
जैसे- कॉलेज में लड़कों को पढ़ते हुए देखकर कोई व्यक्ति यह अनुमान लगा लेता है कि कॉलेज में छुट्टी नहीं है।

2 ) परार्थ अनुमान : जब कोई व्यक्ति पहले अपने लिए किसी विषय का ज्ञान कर लेता है और फिर दूसरे को पाँच अवयवों के द्वारा समझाता है , उसे परार्थ अनुमान कहते हैं ।

जब व्यक्ति खुद समझता है , उसे स्वार्थ अनुमान कहते हैं परन्तु जब दूसरे को समझाता है तो उसे पाँच अवयव द्वारा समझाता है ।

पञ्चावयव

अनुमान प्रमाण के पाँच अवयव बताए गए हैं , जिनके द्वारा विषय को स्पष्ट कर दिया जाता है । ” “प्रतिज्ञाहेतूदाहरणोपनयनिगमनानि पञ्चावयवः “।

पाच अवयव इस प्रकार से हैं
1 ) प्रतिज्ञा
2 ) हेतु
3 ) उदाहरण
4 ) उपनय
5 ) निगमन

1 ) प्रतिज्ञा- का अर्थ है पक्ष में साध्य की घोषणा प्रतिज्ञा का प्रयोजन है कि श्रोता पहले से ही समझ ले कि हम अनुमान द्वारा उसे क्या सिद्ध करके दिखाना चाहते हैं । जैसे : – पर्वत पर अग्नि है , यहां साध्य अग्नि है । अत : अग्नि होना ही हमारी प्रतिज्ञा है ।

2 ) हेतु – हेतु का प्रयोजन है लिंग या वस्तु के विशिष्ट चिन्ह का ज्ञान होना । जैसे : – पर्वत पर अग्नि है अत : वस्तु का विशेष चिन्ह रूप में ज्ञान कराने वाला ही हेतु है ।

3 ) उदाहरण – हेतु के अनन्तर प्रश्न उठता है कि इस हेतु के द्वारा प्रतिज्ञा कैसे सिद्ध हो ? इसका उत्तर उदाहरण वाक्य द्वारा दिया जाता है । अर्थात् व्याप्ति को प्रकट करने वाले दृष्टान्त वचन नही उदाहरण होते हैं । जैसे : – जहां – जहां धूम होता है , वहां – वहां अग्नि होती है , जैसे रसोईघर में ।

4 ) उपनय- उदाहरण में जो बात कही गई है वह वर्तमान हेतु एवं प्रतिज्ञा पर कैसे लागू किया जाए । इसका समाधान चतुर्थ उपनय वाक्य द्वारा किया जाता है । उपनय का अर्थ समझाना या लागू करना है । अर्थात्- जैसा रसोई घर में है वैसे ही यहां भी है ।

5 ) निगमन- सबसे अन्त में निगमन आता है । निगमन में यह सब चीजें एक साथ सम्बन्ध करके परिणाम तक पहुंचती हैं । हम यह भी कह सकते हैं कि साध्य के अस्तित्व के बारे में कोई सन्देह न रहना , उपरोक्त चारों अवयवों का यह निर्णय देना कि अत : पर्वत पर अग्नि है , यही निगमन है ।

आचार्य चरक के अनुसार अनुमान तीन प्रकार का होता है-
१. भूत या अतीत का ज्ञान – गर्भ को देखने से अतीत मैथुन का ज्ञान होता है ।

२. अनागत ( भविष्य ) का ज्ञान – फल का अनुमान बीज से अर्थात् बीज को देखकर किया जाता है ।

३. वर्तमान का ज्ञान – धूम को देखकर वर्तमान छिपी अग्नि का ज्ञान होना ।

• न्याय दर्शन में अक्षपाद ने अनुमान के जिन तीन भेदों का वर्णन किया है —
१ . पूर्ववत् अनुमान
२. शेषवत् अनुमान और
३. सामान्यतोदृष्ट अनुमान इसे ही चरकोक्त ‘ त्रिविध ‘ से ग्रहण करना चाहिये ।

१. पूर्ववत् अनुमान – कारण के द्वारा कार्य का ज्ञान होना ही पूर्ववत् अनुमान है । जैसे — मेघ अर्थात बादल ( कारण ) को देखकर होने वाली वर्षा ( कार्य ) का अनुमान या बीज कारण को देखकर उसके अनुरूप फल ( कार्य ) का अनुमान होना । इसे अनागत अर्थात् भविष्य काल ( Future ) का अनुमान कहते हैं ।

२. शेषवत् अनुमान – कार्य से कारण का ज्ञान होना शेषवत् अनुमान है , जैसे – गर्भ कार्य को देखकर मैथुन ( कारण ) का या फल ( कार्य ) को देखकर उसके बीज ( कारण ) का ज्ञान शेषवत् अनुमान है । यह अतीत अर्थात् भूतकाल ( Past ) का अनुमान है ।

३. सामान्यतो दृष्ट अनुमान – कार्य और कारण से भिन्न अर्थात् बिना कार्य – कारण के सम्बन्ध को देखे ही मात्र लिङ्ग को देखकर ही जब लिङ्गी का ज्ञान करते है तो इसे सामान्यतो दृष्ट अनुमान कहते है , जैसे – धूम ( Smokes ) से अग्नि ( Fire ) का ज्ञान करना । यह वर्तमान ( Present ) काल का अनुमान है ।

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