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ANNSVAROOP VIGYANIYA

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अन्नस्वरूपविज्ञानीय – भाग 4

• मांस वर्ग

• मत्स्य वर्ग-

रोहित ( रोहू मछली – Labeo rohita ) , पाठीन मछली , कूर्म ( कछुआ – Trionix sp . ) , कुम्भीर ( घड़ियाल – Corocodilus propus ) , कर्कट ( केकड़ा – Seillia serrata ) , शुक्ति ( मोती बनाने वाले सीप का कृमि – Lamellidens marginalis ) , शंख ( शंख कृमि Turbo – mormoratus ) , उद्र ( उदबिलाव Cat fishes ) , शम्बूक ( घोंघा कृमि – Lymnaea sp . ) , शफरी ( क्षुद्र मत्स्य ) , वर्मि ( सर्पाकार मछली ) , चन्द्रिका ( मत्स्य जिसके पार्श्व में कांटा हो Pristis cuspidatus ) , चुलूकी ( चुल्लकी ) , नक्र ( बड़ा मगर Crocodilos prososus ) , मकर ( मगर ) , शिशुमार ( सुइंस Eotumerine crocodile crocadilos ) , तिमिङ्गिल ( हेल मछली Delphinus perniger ) राजी और चिलिचिम आदि मत्स्य वर्ग में आते हैं ।

• इस प्रकार मांस के आठ प्रकार वर्णित है- ( १ ) मृग , ( २ ) विष्किर , ( ३ ) प्रतुद , ( ४ ) विलेशय , ( ५ ) प्रसह , ( ६ ) महामृग , ( ७ ) अपचर ( जलचर ) और ( ८ ) मत्स्या ये आठ प्रकार हैं ।

अज ( बकरी – Capra sibica ) और अवी ( भेड़ – Ovis vignei ) ये दोनों प्राणी अनिश्चित योनि वाले हैं , क्योंकि ये जांगल और आनूप दोनों देशों में रहते हैं ।

इन आठ वर्गों में पहले के ( आदि ) तीन ( मृग , विष्किर और प्रतुद ) जाङ्गल , अन्त के तीन ( महामृग , जलचर और मत्स्य ) आनूप और मध्य के दो ( विलेशय और प्रसह ) साधारण देश के कहे गये हैं ।

• जांगल जीवों के मांस का गुण-

ये मल को बाँधने वाले , शीतल और लघु होते हैं । उस सन्निपात ( त्रिदोष ) में जिसमें पित्त प्रधान , वात मध्य और कफहीन हो उसमें हितकारक होता है ।

• शश ( खरगोश -Coryctolagus cuniculus ) के मांस का गुण-

जठराग्नि को दीप्त ( तीव्र ) करने वाला , विपाक में कटु , ग्राही ( स्तम्भन करने वाला ) , रूक्ष और शीतल होता है ।

• वर्तक ( बटेर Francolinus sp . ) आदि के मांस का गुण-

थोड़ा ( ईषत् ) गरम , गुरु ( Heavy ) , स्निग्ध और बृंहणकारक ( पुष्टिकारक ) होता है । तित्तिर ( Francolinus ) का मांस श्रेष्ठ ( वर ) होता है , यह मेधा ( बुद्धि ) , जठराग्नि , बल और शुक्र को बढ़ाने वाला होता है । यह ग्राही , वर्ण ( Complexion ) को बढ़ाने वाला और वात प्रधान सन्निपात को नष्ट करने में उत्तम है । 

• मोर ( शिखी – Pavo cristasus ) के मांस का गुण-

यह अधिक पथ्य नहीं होता है , किन्तु श्रोत्र ( कान ) , स्वर और आयु ( वय ) की दृष्टि से पथ्य ( हितकारक ) होता है ।

•  कुक्कुट ( Gallus – Gallus ) के मांस का गुण-

यह मोर ( Pavo cristasus ) के समान गुणवाला होता है , किन्तु अधिक वृष्य कारक ( शुक्रवर्द्धक Aphrodisiac ) होता है , इनमें ग्राम्य ( पालतू ) मुर्गा कफकारक और गुरु होता है ।

• क्रकर ( बया पक्षी – Ploceus phillipinus ) और उपचक्र ( चकवा पक्षी ) के मांस का गुण-

यह मेधा ( बुद्धि ) और अग्निवर्द्धक तथा हृदय के लिये हितकारक होता है । 

• काणकपोत ( काला कबूतर – Columba livia ) के मांस का गुण- यह गुरु ( भारी – Heavy ) , थोड़ा नमकीन और तीनों दोषों को उत्पन्न करने वाला है । 

• चटक ( गौरैय्या – Passer domesticus ) के मांस का गुण- यह कफकारक , स्निग्ध , वातनाशक और शुक्र को बढ़ाने में उत्तम होता है ।

• महामृगादि के मांस के गुण-

इनमें ( मांसवर्गों में ) महामृग का मांस शीत होता है , और प्रसहा वर्ग में मांस खाने वाले ( क्रव्याद ) जन्तु का मांस अनुरस में लवण , विपाक में कटु और मांसवर्द्धक होता है । पुराने अर्श ( Chronic piles ) , ग्रहणी ( Sprue ) रोग और शोष के रोगियों में यह अत्यन्त हितकारी होता है ।

• बकरे ( Capra sibica ) के मांस का गुण-

यह न तो अधिक शीतल होता है , न अधिक गुरु ( भारी – Heavy ) होता है और न हि अधिक स्निग्ध ( चिकना – Oily ) होता है , इसलिये यह अदोषकर अर्थात् दोष उत्पन्न करने वाला नहीं होता है । इसके मांस के मनुष्य के शरीर के धातु ( रस – रक्तादि ) के समान होने के कारण बृंहण कारक ( मांस आदि बढ़ाने वाला ) होने पर भी अभिष्यन्दी ( स्रोतसों में अवरोध ) करने वाला नहीं होता है ।

• भेंड़ ( Ovis vignei ) के मांस का गुण-

यह बकरे ( Capra sibica ) के मांस के विपरीत गुणों वाला ( अत्यन्त उष्ण स्निग्ध – गुरु , त्रिदोषकारक और अभिष्यन्दिकारक ( स्रोतसों को अवरुद्ध करने वाला ) होता है किन्तु बृंहण ( मांस को बढ़ाने वाला ) करने वाला होता है ।

• गो ( Bos indicus ) मांस का गुण-

यह सूखी खांसी ( Dry cough ) , श्रम ( थकान – Fatigue ) , अत्यन्त अग्नि ( भस्मक रोग ) , विषम ज्वर , पीनस ( प्रतिश्याय ) कृशता ( मांस क्षय – Ematiation ) और शुद्ध वातज रोगों को नष्ट करता है ।

• भैंस ( Bos bubalus ) के मांस का गुण-

यह उष्ण , गुरु ( भारी ) , निद्राकारक , शरीर में दृढ़ता उत्पन्न करने वाला और बृंहणकारक ( मांसवर्द्धक ) होता है ।

• सूअर ( Sus cristasus ) के मांस का गुण-

यह भैंस ( Bos bubalus ) के मांस के गुण के समान ही होता है और श्रम ( थकान – Fatigue ) नाशक , रुचि – शुक्र तथा बलकारक होता है । 

• मछली ( Fish ) का गुण-

यह कफ को अत्यन्त मात्रा में उत्पन्न करने वाली होती है किन्तु चिलचिम मछली त्रिदोष ( वात पित्त – कफ ) कारक होती है । 

• सर्वोत्तम मांस- अपने – अपने वर्गों में विष्किरों में लाव ( बटेर – Turnix sp . ) , मछलिोयं में रोहित ( Labio rohita ) , विलेशयों में गोह ( Varanus monitor ) , और मृगों में एण ( Antilope ceruicupra ) अत्यन्त श्रेष्ठ ( वरां ) होते है ।

• खाने योग्य मांस- तुरन्त मारा गया ( सद्यो + हतं ) , शुद्ध ( विष आदि से रहित ) और युवा पशु मांस खाने योग्य होता है ।

• त्याज्य मांस- मरे ( स्वयं ) हुये , कृश ( दुर्बल ) , अत्यधिक मेद वाले , और रोग , पानी में डूबकर या विष से मरे हुये पशु पक्षी का मांस सेवन नहीं करना चाहिये ।

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