fbpx

ANNRAKSHA ADHYAY

by

अन्नरक्षा अध्याय

• चिकित्सक का स्थान-

राजा को चाहिये कि प्राणाचार्य ( राज के चिकित्सक ) का निवास स्थान राजगृह के समीप ही दे , क्योंकि इससे चिकित्सक सदैव और सभी अवस्थाओं में जाग्रत ( सतर्क ) रहता है । 

• विष से राजा के अन्नपान की रक्षा-

विशेष रूप से राजा ( महीपते ) के अन्नपान की विष से रक्षा करनी चाहिये ।

• विषयुक्त भात ( पका चावल ) – विषयुक्त भात गाढ़ा होता है और स्त्राव्ययुक्त ( टपकाने योग्य ) होने पर भी इसे छाना नहीं जा सकता है । यह देर में पचता है , ताजा पकाने पर भी बासी ( पर्युषित ) भात के समान हो जाता है । इस भात की , भाप ( Steam ) मोर के कण्ठ के समान नीली होती है , इसके सेवन से मोह ( भ्रम – Dizziness ) , मूछा ( Unconsciousness ) और प्रसेक ( लालासाव – Salivation ) होता है ।

यह भात वर्ण ( Colour ) और गन्ध ( Smell ) में हीन हो जाता है , गीला होता है और इससे चन्द्रिका ( पानी में पड़े तेल के बिन्दु के समान चमक ) दिखायी देती है ।

• विषयुक्त व्यञ्जन-

विषयुक्त भोजन ( शाकादि ) शीघ्र ही सूख जाते है , और जिस जल में इसे पकाया ( क्वाथानि ) जाता है , वह जल श्याम वर्ण का हो जाता है । इस जल में छाया ( Shadow ) हीन , अधिक या विकृत दिखायी देती है या दिखायी ही नहीं देती है । ऐसे खाद्य पदार्थ में झाग , ऊपर रेखायें , विभाग , तन्तु या बुलबुले ( Bubbles ) उत्पन्न हो जाते हैं । राग ( रायता ) , खाण्डव , शाक ( सब्जी ) और मांस फट ( विच्छिन्न हो ) जाते है और इनका रस ( स्वाद ) नष्ट हो जाता है ।

• विषयुक्त मांसरस , दुग्ध , दही आदि- विष के कारण मांस रस में नीली रेखा , दुग्ध ताम्र ( Copper ) वर्ण का और दही श्याव ( काल ) रंग की दिखायी देती है , तक्र पीला और काला हो जाता है , घृत पानी के समान , मस्तु ( दही का जलीय भाग ) कबूतर के वर्ण का , तुषोदक ( कांजी ) – मद्य और जल में काली रेखा , मधु में हरे रंग की और तैल में लाल रंग की रेखा हो जाती है ।

विष के कारण कच्चे फल पक जाते हैं और पके फल सड़ ( कोथन ) जाते हैं । गीले ( आर्द्र ) द्रव्य सूख जाते हैं और शुष्क द्रव्य विवर्ण हो जाते हैं । मृदु द्रव्य कठोर और कठोर द्रव्य मृदु हो जाते हैं । माला के पुष्पों का अग्रभाग फट ( स्फुटित ) हो जाता है , माला मुझी जाती है और दूसरी गन्ध उत्पन्न हो जाती है ।

•  विषदाता के लक्षण- विष देने वाले व्यक्ति का मुख ( आस्य ) काला हो जाता है और सूखने लगता है , उद्देश्य के बिना ) ही इधर – उधर दिशाओं में देखता ( वीक्षते ) है । स्वेद ( पसीना ) , वेपथु ( कंपकपी ) , डरा हुआ और घबड़ाया हुआ रहता है में लड़खड़ाता ( स्खलति ) और जंभाइयां ( Yawaning ) लेता है ।

• विषयुक्त अन्न की अग्नि से परीक्षा-

विषयुक्त अन्न को अग्नि में डालने से अग्नि एक ही आवर्त ( घेरे के रूप में एक ही लौ ) में जलती है और चटचट ( Cracking sound ) की आवाज होती है । धूम ( Fume ) और लौ ( Flame ) मोर के कण्ठ ( शिखि + कण्ठाभ ) के समान होती है या लौ ही नहीं होती है और उग्र ( तेज ) गन्ध होती है ।

• विष सेवन किये की चिकित्सा- विष खाये हुये व्यक्ति का शोधन- वमन और विरेचन के द्वारा करने के बाद हृदय शोधन के लिये सूक्ष्म ताम्रभस्म को मधु के साथ देना चाहिये । हृदय का शोधन होने के बाद एक शाण ( 3 gm . ) की मात्रा में हेमचूर्ण ( स्वर्ण भस्म ) देना चाहिये ।

•  स्वर्ण का गुण- जिस प्रकार कमल के पत्ते पर जल ( अम्बु ) नहीं रुकता है वैसे ही हेम ( स्वर्ण ) सेवन करने वाले के शरीर में विष का प्रभाव नहीं होता है । इससे दीर्घायु होती है अत : गर विष में भी यही चिकित्सा करनी चाहिये ।

•  विरुद्ध आहार विष तुल्य- विरुद्ध आहार भी विष के समान सद्य : या गर विष के समान कालान्तर में मृत्युकारक होता है ।

• तीन उपस्तम्भ- आहार , शयन ( निद्रा ) और अब्रह्मचर्य इनका नित्य युक्तिपूर्वक सेवन करने से शरीर का उसी प्रकार धारण होता है जैसे स्तम्भों से मकान ( आगार ) धारण होता हैं।

• आहार- आहार का वर्णन वहाँ – वहाँ ( विषयानुसार ) का दिया ( वक्ष्यते ) गया है ।

• निद्रा की प्रधानता- सुख , दुःख , पुष्टि ( शरीर की ) , कृशता , बल , अबल ( निर्बलता ) , वृषता , क्लीवता ( Impotency ) , ज्ञान , अज्ञान , जीवन और मृत्यु ये सभी निद्रा के ही अधीन ( ऽऽयत्तं ) होते हैं ।

• अकाल निद्रा से हानि- बिना समय के निद्रा , अतिनिद्रा और निद्रा का सेवन नहीं करने से ये सुख और आयु को करते हैं , ये तीनों दूसरी काल रात्रि के समान होते हैं ।

• रात्रि जागरण और दिवास्वप्न- रात्रि में जगने से रूक्षता ( Dryness ) की वृद्धि , दिन में सोने से स्निग्धता ( कफ ) की वृद्धि होती है और बैठ कर सोने से न तो रूक्षता ( वात ) की वृद्धि होती है न स्निग्धता ( कफ ) की ही वृद्धि होती है ।

• निंद्रा का समय- इसलिये अपने समय ( कालमतो ) के अनुसार और अपनी सात्म्यता ( अनुकूलता -६ से ८ घंटे तक ) के अनुसार रात्रि में सोना चाहिये । यदि रात्रि में असात्म्य ( प्रतिकूल ) जागरण किया हो तो प्रात : काल का भोजन किये बिना आधी और निद्रा लेनी चाहिये ।

• ब्रह्मचर्य- जो ब्रह्मचर्य में लगा हुआ हो , ग्राम्य ( मैथुन ) सुख से विरक्त मन वाला ( निस्पृहचेतसः ) और सन्तुष्ट तथा तृप्त हो उस व्यक्ति में निद्रा अपने समय का अतिक्रमण न कर स्वयं ही समय पर आ जाती है ।

Leave a Comment

error: Content is protected !!