fbpx

Agadtantra Introduction

by

परिचय ( Introduction)

 ‘ अगदतन्त्र ‘ दो शब्दों से मिलकर बना है

‘अगद ‘ + ‘ तन्त्र’।

अगदतन्त्र के मर्म को समझने के लिए इन दोनों शब्दों को समझना आवश्यक है ।

• अगद ( Agada ) ) गद शब्द ‘ गद् ‘ धातु में अच् प्रत्यय लगकर बना है जिसका अर्थ होता है – रोग पीड़ा या विष । गद में ‘ अ ‘ उपसर्गपूर्वक लगकर अगद बना है ।

इसकी दो प्रकार से व्याख्या की जा सकती है

1. नास्ति गदो यस्य ‘ अर्थात् नीरोग या रोगरहित और

2. ‘ नास्ति गदो यस्मात् ‘ अर्थात् ओषध , स्वास्थ्य या विषनाश करने का विज्ञान । |

• अगद के पर्याय ( Synonyms of Agada )

आचार्य अमरसिंह विरचित अमरकोष में अगद शब्द के लिए निम्न पर्याय आये हैं :

“भेषजौषधभैषज्यान्यगदो जायुरित्यपि । “( अमरकोष 2.6.50 )

भेषजम्

औषधम्

भैषज्यम्

जायुः

अगदः

• तन्त्र ( Tantra )

‘ तन्त्र ‘ शब्द की व्याख्या करते हुए कहा गया है –

“त्रायते शरीरमननेति तन्त्रम् ।”

 अर्थात् जिसके द्वारा शरीर की रक्षा की जाये , उसे तन्त्र कहते हैं ।

शरीर की रक्षा शास्त्र और चिकित्सा दोनों के द्वारा की जाती है । शास्त्र मनुष्य को ज्ञान प्रदान कर उसके मानसिक एवं नैतिक पक्ष की रक्षा करता है और चिकित्सा उसके मनोदैहिक तन्त्र को आरोग्य प्रदान करती है ।

 • अगदतन्त्र की परिभाषा ( Definition of Agada – tantra )

•आचार्य सुश्रुत मतेन

आचार्य सुश्रुत ( सुश्रुतसंहिता के प्रसिद्ध रचनाकार एवं ‘ Father of Surgery ‘ उपाधि द्वारा अलंकृत ) ने इसकी परिभाषा निम्न शब्दों में दी है –

“अगदतन्त्रं नाम सर्पकीटलतामूषकादिदष्टविषव्यञ्जनार्थं विविधविषसंयोगोपशमनार्थं च । “( सु सू 1.6 )

अगदतन्त्र ( Toxicology ) आयुर्वेद की उस शाखा का नाम है , जिसमें सर्प , कीट ( कीड़े ) , लूता ( मकड़ी ) आदि से दंष्ट हुए तथा अन्य विविध प्रकार के स्वाभाविक , कृत्रिम एवं संयोगज विष से उपहत प्राणियों की पीड़ा के उपशमन , निदान एवं चिकित्सा का विधान किया गया हो ।

•  अष्टांग आयुर्वेद में वर्णन

-चरक संहिता च.सू. 30/28

कायचिकित्सा

कौमारभृत्यक्

भूतविद्या

शालाक्यम्

शल्यापहर्तृकम्

विषगरवैरोधिकप्रशमन

रसायन

वाजीकरण

-सुश्रुत संहिता सु.सू. 1/6

शल्यम्

शालाक्यम्

कायचिकित्सा

भूतविद्या

कौमारभृत्यम्

अगदतन्त्र

रसायनतन्त्र

वाजीकरणतन्त्र

• अगदतन्त्र तथा विषविज्ञान का क्षेत्र ( ( Scope of Agadatantra )

अगदतन्त्र का क्षेत्र बड़ा ही व्यापक है । विप का स्वरूप , उसके स्रोत , भेदोपभेद , गुणधर्म , लक्षण एवं चिह्न , प्राणियों पर उसकी प्रतिक्रिया , वेग , वेगान्तर , वेगगत विशिष्ट लक्षण , विषपान एवं विषदान से सम्बन्धित समस्याएं , उनका निदान तथा उपचार , नैदानिक एवं उपचारात्मक विधियों की खोज , विषपान एवं विषदान उत्पन्न नैतिक एवं वैधानिक समस्याएँ , संदिग्ध विषाक्तता में चिकित्सक के कर्तव्य , विष का चिकित्सात्मक उपयोग , चिकित्सात्मक एवं मारक मात्राओं का निर्धारण , उनके क्रय – विक्रय , उपलब्धि तथा व्यवस्था पत्रों में उनकी अनुशंसा पर नियन्त्रण , उनसे सम्बन्धित कानून , विषाक्तता से उत्पन्न वैयक्तिक एवं सामुदायिक समस्याएं आदि सभी इसके अन्तर्गत आ जाती हैं ।

• अगदतन्त्र का प्रयोजन और उसकी उपयोगिता ( ( Aim of Agadatantra and its utility )

आयुर्वेद के समान ही अगदतन्त्र के दो मुख्य प्रयोजन हैं –

1. स्वस्थ प्राणियों की विष के प्रभावों से रक्षा ।

2. विषाक्तता से ग्रस्त प्राणियों का कष्ट – निवारण कर उन्हें आरोग्य प्रदान करना ।

Leave a Comment

error: Content is protected !!