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ABHAV VIGYANIYA

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अभाव – विज्ञानीय

चरक ने सूत्र के ११ वें अध्याय में यही बताया है कि यह सम्पूर्ण जगत दो भागों में विभक्त हैं –

१. ‘ सत् ‘ – इसकी सत्ता जगत में दिखायी देती है , और अनुभव भी होता है , इसे ‘ भाव ‘ पदार्थ भी कहते हैं , और

२. ‘ असत् ‘ – जिसकी न तो सत्ता जगत में दिखायी देती है , और न तो अनुभव ही होता है । इसे ‘ अभाव ‘ पदार्थ भी कहते हैं ।

•अभाव के दो भेद हैं –
1.संसर्गाभाव
2.अन्योन्याभाव

• 1.संसर्गाभाव – संसर्ग का अर्थ है संयोग या सम्बन्ध । जहाँ संयोग आदि सम्बन्ध से एक वस्तु में दूसरी वस्तु के संसर्ग का सम्बन्ध नही होता है उसे संसाभाव कहते है । जैसे वृक्ष पर पक्षी नहीं है ।

संसर्गाभाव के पुनः तीन भेद हैं .-
१.प्राग्भाव
२. प्रध्वंसाभाव
३. अत्यन्ताभाव

१. प्राग्भाव कार्य की उत्पति से पूर्व जिसका अभाव हो । जिस अभाव का आदि न हो परन्तु अन्त हो उसे प्राग्भाव कहते हैं ।
जैसे चूर्ण बनने से पहले उसका अभाव पारभाव कहलाता है ।

२. प्रध्वंसाभाव किसी कार्य की उत्पत्ति के बाद उसका अभाव होता है । यह अभाव आदि सहित पर अनन्त होता है ।
जैसे विटी का घडा टूट कर उसका अभाव होना ।

३ . अत्यन्ताभाव किसी वस्तु का अभाव तीनो कालों मे रहता है । जैसे पुरूष मे गर्भा शय का अभाव । आमलकी मे लवण रस का अभाव।

• 2. अन्योन्याभाव इस अभाव मे किसी अन्य वस्तु का अन्य वस्तु मे अभाव दर्शाया जाता है ।
जैसे काली मरिच मधुर नही यानि मरिच मे अन्य वस्तु मधुर का अभाव है । यह घट है पट नही है यानि घट मे पट का अभाव है ।

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