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AYUSHKAMIY ADHYAY PART -3

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आयुष्कामीय अध्याय

“शोधनं शमनं चेति समासादौषधं द्विधा ।”

औषध के भेद – संक्षिप्त रूप से औषध ( चिकित्सा ) दो प्रकार की होती है — १.शोधन अर्थात् वमन – विरेचन आदि विधियों से दोषों को निकालना शोधन कहा जाता है और २. शमन अर्थात् उभड़े हुए वात आदि दोषों को शान्त करने का उपचार ।

“शरीरजानां दोषाणां क्रमेण परमौषधम्” ॥२५ ॥
बस्तिर्विरेको वमनं तथा तैलं घृतं मधु ।

शारीरिक दोषों की चिकित्सा – शरीरसम्बन्धी दोषों की उत्तम चिकित्सा क्रमश : इस प्रकार है — वातदोष की चिकित्सा बस्ति – प्रयोग , पित्तदोष की चिकित्सा विरेचन – प्रयोग तथा कफदोष की चिकित्सा वमन – प्रयोग है तथा वातदोष में तैल , पित्तदोष में घृत और कफदोष में मधु का प्रयोग उत्तम शमन – चिकित्सा है ।॥ २५ ॥

“धीधैर्यात्मादिविज्ञानं मनोदोषौषधं परम् ॥२६ ॥ “

मानसिक दोषों की चिकित्सा – मानसिक ( रजस् तथा तमस् ) दोषों की उत्तम चिकित्सा है — बुद्धि तथा धैर्य से व्यवहार करना और आत्मादि विज्ञान ( कौन मेरा है , क्या मेरा बल है , यह कौन देश तथा कौन मेरे हितैषी या सहायक हैं ) का विचार कर कार्य करना ॥२६ ॥

“भिषग्द्रव्याण्युपस्थाता रोगी पादचतुष्टयम् ।
चिकित्सितस्य निर्दिष्टं , प्रत्येकं तच्चतुर्गुणम् ।। २७ ॥”

चिकित्सा के चार पाद – चिकित्सा – कर्म के चार पाद ( चरण या विभाग ) माने जाते हैं । जैसे १. भिषक् ( वैद्य या चिकित्सक ) , २. द्रव्य ( मैनफल आदि वमनकारक अर्थात् शोधन द्रव्य , गुरुच आदि शमन द्रव्य तथा बस्ति आदि शोधन उपकरण ) , ३. उपस्थाता उप समीपे तिष्ठतीति ) —परिचारक जो रोगी के पास में रहकर उसकी देख – भाल करे ; उसे उठाये , बैठाये , खिलाये , पिलाये तथा मल – मूत्र करने में सहायता करे ) और ४. रोगी । इन चारों में प्रत्येक में चार – चार गुण होने चाहिए ।। २७ ॥

“दक्षस्तीर्थात्तशास्त्रार्थो दृष्टकर्मा शुचिभिषक् ।”

वैद्य के चार लक्षण- १. दक्ष ( चिकित्साकर्म में कुशल ) , २. तीर्थ ( आचार्य ) से शास्त्र ( आयुर्वेदशास्त्र ) के अर्थ को ग्रहण कर चुका हो । ३. दृष्टकर्मा ( चिकित्सा की विधियों को जो अनेक बार देख चुका हो ) और ४. जो शुचि ( शरीर तथा आचरण से पवित्र ) हो ।

“बहुकल्पं बहुगुणं सम्पन्नं योग्यमौषधम् ॥२८।।”

औषध – द्रव्य के चार लक्षण – १.बहुकल्प ( जो स्वरस , क्वाथ , फाण्ट , अवलेह , चूर्ण आदि अनेक रूपों में दिया जा सकता ) हो , २. बहुगुण ( जो औषध के सभी गुणों से सम्पन्न ) हो , ३. सम्पन्न ( अपने गुणों की सम्पत्ति से जो युक्त ) हो और ४. योग्य ( जो रोग – रोगी , देश , काल आदि के अनुकूल ) हो ।॥२८ ॥

“अनुरक्तः शुचिर्दक्षो बुद्धिमान् परिचारकः । “

परिचारक ( उपस्थाता ) के चार लक्षण- १. अनुरक्त ( रोगी से स्नेह रखने वाला ) , २. शुचि ( खान – पान , औषधि खिलाने , रखने आदि में साफ – सफाई रखने वाला ) , ३. दक्ष ( कुशल ) तथा ४. बुद्धिमान् समयोचित सूझ – बूझ वाला ) होना चाहिए ।

“आढ्यो रोगी भिषग्वश्यो ज्ञापकः सत्त्ववानपि ॥२ ९ ॥”

रोगी के चार लक्षण- १. आढ्य ( धन – जन आदि से सम्पन्न ) , २. भिषग्वश्य ( वैद्य की आज्ञानुसार औषध तथा पथ्य सेवन करने वाला ) , ३. ज्ञापक ( अपने सुख – दुःख कहने में सक्षम ) तथा ४. सत्त्ववान् ( मानसिक शक्तिसम्पन्न अर्थात् चिकित्साकाल में होने वाले कष्टों से न घबड़ाने वाला ) हो ॥२ ९ ॥

( साध्योऽसाध्य इति व्याधिर्द्विधा , तौ तु पुनर्द्विधा ।
सुसाध्यः कृच्छ्रसाध्यश्च , याप्यो यश्चानुपक्रमः ॥ )
सर्वोषधक्षमे देहे यूनः पुंसो जितात्मनः ।
अमर्मगोऽल्पहेत्वग्ररूपरूपोऽनुपद्रवः ।। ३० ॥ अतुल्यदूष्यदेशर्तुप्रकृतिः पादसम्पदि । ग्रहेष्वनुगुणेष्वेकदोषमार्गो नवः सुखः ॥३१ ॥

साध्य – असाध्य के अनुसार व्याधि के भेद -१ . साध्य तथा २. असाध्य इस प्रकार रोग के दो भेद होते हैं । इनके भी पुनः दो भेद होते हैं -१ . सुखसाध्य एवं २. कृच्छ्र ( कष्ट ) साध्य । इसके बाद असाध्य के दो भेद होते हैं —१ . याप्य ( कुछ दिन चिकित्सा द्वारा चलाने योग्य ) और २. अनुपक्रम अर्थात् चिकित्सा के अयोग्य या प्रत्याख्येय ( जवाब देकर चिकित्सा करने योग्य ) ||

सुखसाध्य रोग के लक्षण — जिस रोगी का शरीर सभी प्रकार की चिकित्साविधियों को सहन करने में समर्थ ( सक्षम ) हो , जो युवक ( बालक या वृद्ध न ) हो , जो जितेन्द्रिय हो , जिसका रोग किसी मर्मस्थल में उत्पन्न न हुआ हो , जिस रोग के उत्पादक हेतु ( कारण ) , पूर्वरूप , रूप आदि थोड़े एवं सामान्य ( उग्र न ) हों , जिसमें अभी तक कोई उपद्रव पैदा न हुए हों तथा जिसमें दूष्य , देश , ऋतु एवं प्रकृति समान न हों , चिकित्साकाल में उक्त चारों पाद अपने – अपने गुणों से सम्पन्न हों ; सूर्य – चन्द्र आदि ग्रह अनुकूल हों , रोग एक दोष से उत्पन्न हों , एकमार्गगामी हो ( जैसे रक्तपित्तरोग — ‘ ऊर्ध्वं साध्यम् ‘ ) और रोग नया हो।।३०-३१।।

“शस्त्रादिसाधनः कृच्छ्रः सङ्करे च ततो गदः । “

कष्टसाध्य रोग के लक्षण – कृच्छ्र शब्द का अर्थ है — कष्ट । कष्टसाध्य वे रोग होते हैं जिनमें शस्त्र , क्षार , अग्नि ( दाह ) कर्म तथा विष आदि के प्रयोग किये जाते हैं । जिन रोगों में ऊपर कहे गये सुखसाध्य के लक्षण संकर ( मिले – जुले ) हों अर्थात् पूर्णरूप से विद्यमान न हो ।

“शेषत्वादायुषो याप्यः पथ्याभ्यासाद्विपर्यये ॥३२ ॥”

याप्य रोग के लक्षण — उस रोग को ‘ याप्य ‘ कहते हैं जिसमें पूर्वोक्त सुखसाध्य के लक्षणों से विपरीत लक्षण हों , किन्तु आयु के शेष ( बचे ) रहने के कारण तथा पथ्य ( हितकर ) आहार – विहार तथा औषध यथायोग्य चिकित्सा ) के अभ्यास ( लगातार सेवन ) करने के कारण रोगी चल – फिर सक रहा हो ॥ ३२ ॥

“अनुपक्रम एव स्यास्थितोऽत्यन्तविपर्यये ।
औत्सुक्यमोहारतिकृद् दृष्टरिष्टोऽक्षनाशनः ।। ३३ ।। “

प्रत्याख्येय रोग के लक्षण — उस रोग को अनुपक्रम ‘ भी कहते हैं जो सुखसाध्य लक्षणों से अत्यन्त विपरीत हो और जो औत्सुक्य , मोह तथा अरति ( बेचैनी ) लक्षणों वाला हो , जिसमें अरिष्ट लक्षण दिखलायी दे रहे हों एवं जिसमें ज्ञानेन्द्रियों का नाश हो गया हो । ३३ ।।

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