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AYUSHKAMIYA ADHYAY PART -2

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आयुष्कामीय अध्याय

“रसासृमांसमेदोऽस्थिमज्जशुक्राणि धातवः ।
सप्त दूष्या :

धातुओं का वर्णन – आयुर्वेदशास्त्र में रस , रक्त , मांस , मेदा , अस्थि , मज्जा तथा शुक्र ये सात ‘ धातु कहे जाते हैं और जब ये वात आदि दोषों द्वारा दूषित किये जाते हैं , तो इन्हें ‘ दृष्य ‘ कहते हैं ।

-मला मूत्रशकृत्स्वेदादयोऽपि च ॥१३ ॥

मलों का वर्णन – मूत्र , पुरीष तथा स्वेद ( पसीना ) आदि मल कहे जाते हैं ।। १३ ।।

“वृद्धिः समानैः सर्वेषां विपरीतैर्विपर्ययः ।”

दोष – धातु – मलों की वृद्धि एवं क्षय – शरीर से सम्बन्धित उक्त वात आदि दोषों , रस आदि धातुओं तथा मलों के समान गुण – धर्म वाले पदार्थों का सेवन करने से उन – उन की वृद्धि होती है और उन – उन के विपरीत गुण वाले पदार्थों का सेवन करने से उनका क्षय होता है ।

“स्वाद्वम्ललवणतिक्तोषणकषायकाः ॥१४ ॥”
षद द्रव्यमाश्रितास्ते च यथापूर्व बलावहाः ।”

रसों का वर्णन — आयुर्वेदशास्त्र में रसों की संख्या छः है — १.स्वादु ( मीठा ) , २. अम्ल ( खट्टा ) , ३. लवण ( नमकीन ) , ४. तिक्त ( नीम तथा चिरायता आदि ) , ५. ऊषण ( कटु – कालीमिर्च आदि ) तथा ६. कषाय ( कसैला – हरीतकी आदि ) । ये सभी रस भिन्न – भिन्न द्रव्यों में पाये जाते हैं ।
ये रस अन्त की ओर से आगे की ओर को बलवर्धक होते हैं अर्थात् मधुर रस सबसे अधिक बलवर्धक होता है और इसके बाद सभी रस उत्तरोत्तर बलनाशक होते हैं।॥१४ ॥

“तत्राद्या मारुतं घ्नन्ति त्रयस्तिक्तादयः।
कफम् कषायतिक्तमधुराः पित्तमन्ये तु कुर्वते ।”

रसों का वात आदि पर प्रभाव – उनमें प्रथम तीन ( मधुर , अम्ल , लवण ) रस वातदोष को नष्ट करते हैं , तिक्त , कटु , कषाय कफदोष को नष्ट करते हैं और कषाय , तिक्त , मधुर रस पित्त को नष्ट करते हैं । इससे विपरीत रस वात , पित्त , कफ दोषों को बढ़ाते हैं।।१५ ।।

“शमनं कोपनं स्वस्थहितं द्रव्यमिति विधा ॥१६ ॥”

द्रव्य का वर्णन – विधिभेद से द्रव्य तीन प्रकार का होता है — १.शमन ( वात आदि दोषों का शमन करने वाला ) , २. कोपन ( वात आदि दोष को कुपित करने वाला ) तथा ३. स्वस्थहित ( स्वस्थ पुरुष के स्वास्थ्य को बनाये रखने वाला ) ॥१६ ॥

“उष्णशीतगुणोत्कर्षात्तत्र वीर्यं द्विधा स्मृतम् ।”

वीर्य का वर्णन — द्रव्यों में शीतगुण तथा उष्णगुण की अधिकता से दो प्रकार का ‘ वीर्य ‘ माना जाता है ।

“त्रिधा विपाको द्रव्यस्य स्वादुम्लकटुकात्मकः “।।१७ ।।

विपाक का वर्णन — भले ही कोई द्रव्य किसी रस से युक्त क्यों न हो , उसका विपाक तीन प्रकार का होता है —१ . मधुर , २. अम्ल तथा ३. कटु ।।१७ ।।

“गुरुमन्दहिमस्निग्ध लक्ष्णसान्द्रमृदुस्थिराः । गुणाः ससूक्ष्मविशदा विंशतिः सविपर्ययाः “।।१८ ।।

द्रव्य के गुणों का वर्णन — द्रव्यों में परस्पर विपरीत ये २० गुण पाये जाते हैं —१ . गुरु , २. लघु , ३. मन्द , ४. तीक्ष्ण , ५. शीत , ६. उष्ण , ७. स्निग्ध , ८. रूक्ष , ९ . श्लक्ष्ण , १०. खर , ११. सान्द्र , १२. द्रव , १३. मृदु , १४. कठिन , १५. स्थिर , १६. सर , १७. सूक्ष्म , १८.८ , १ ९ . विशद और २०. पिच्छिल ।।१८ ।।

“कालार्थकर्मणां योगो हीनमिथ्यातिमात्रकः । सम्यग्योगश्च विज्ञेयो रोगारोग्यैककारणम् “।। १ ९ ।।

रोग एवं आरोग्य के कारण — काल , अर्थ तथा कर्म के हीनयोग , मिथ्यायोग एवं अतियोग रोग या रोगों की उत्पत्ति में एक मात्र कारण होते हैं तथा काल , अर्थ और कर्म का सम्यक् योग आरोग्य ( स्वस्थ रहने ) का एक मात्र कारण होता है ।।१९ ।।

“रोगस्तु दोषवैषम्यं दोषसाम्यमरोगता ।”

रोग – आरोग्य में भेद – वात , पित्त , कफ इन तीन दोषों की विषमता या विषम अवस्था का नाम ‘ रोग ‘ है । अर्थात् दोषों के विषम ( किसी का बढ़ जाना और किसी का घट जाना ) हो जाने से किसी न – किसी प्रकार का रोग हो जाता है और जब उक्त दोष समान स्थिति में रहते हैं तब आरोग्य की प्राप्ति होती है अर्थात् मानव ‘ सुखी रहता है ।

“निजागन्तुविभागेन तत्र रोगा द्विधा स्मृताः” ।।२० ।।

रोगों के दो भेद – सामान्य रूप से रोग दो प्रकार के होते हैं —१ . निज ( वात आदि भीतरी दोषों की विषमता से होने वाले ) तथा २. आगन्तुज ( अभिघात आदि बाहरी कारणों से होने वाले ) ।।२० ।।

“तेषां कायमनोभेदादधिष्ठानमपि द्विधा । “

दो प्रकार के रोगाधिष्ठान – रोगों के अधिष्ठान ( आश्रयस्थान ) भी दो होते हैं -१ . काय ( शरीर ) २.मन

“रजस्तमश्च मनसो द्वौ च दोषावुदाहृतौ ।। “२१ ।।

मानसिक दोषों का परिचय – मनस् के दो दोष हैं- १. रजस् ( रजोगुण ) और २. तमस् ( तमोगुण ) ।

“दर्शनस्पर्शनप्रश्नैः परीक्षेत च रोगिणम् “।

रोगी की परीक्षा दर्शन ( देखना ) , स्पर्शन ( हाथ आदि से छूकर देखना ) तथा रोग सम्बन्धी विविध प्रश्न पूछकर रोगी ( रोग से पीड़ित शरीर वाले ) की परीक्षा करनी चाहिए ।

“रोग निदानप्राग्ररूपलक्षणोपशयाप्तिभिः “।। २२ ।।

रोग की परीक्षा – निदान , पूर्वरूप , लक्षण , उपशय तथा सम्प्राप्ति नामक रोगज्ञान के उपायों से रोग की परीक्षा करनी चाहिए ।। २२ ।।

“भूमिदेहप्रभेदेन देशमाहुरिह द्विधा ।”

देशभेदों का वर्णन — आयुर्वेदीय दृष्टिकोण के अनुसार देश दो प्रकार का होता है —१ . भूमिदेश और २. देहदेश । शरीर के विभिन्न अवयवों को यहाँ देहदेश कहा गया है । भूमिदेश का वर्णन आगे किया जा रहा है ।

“जाङ्गलं वातभूयिष्ठमनूपं तु कफोल्बणम्” ।। २३।।
साधारणं सममलं त्रिधा भूदेशमादिशेत् । “

भूमिदेश का वर्णन – भूमिदेश तीन प्रकार का कहा गया है —१ . जांगल देश ; यहाँ हवा अधिक चलती है , २. आनूप देश ; इस देश में कफदोष की प्रधानता रहती है और ३. साधारण देश ; इस देश में वात आदि तीनों दोष समान अवस्था में रहते हैं ।॥ २३ ॥

“क्षणादिाध्यवस्था च कालो भेषजयोगकृत् “।। २४ ॥

काल के भेद आयुर्वेद में काल दो प्रकार का माना जाता है —१ . क्षण अर्थात् प्रातःकाल तथा सायंकाल और २. रोग की अवस्था ( आमावस्था एवं जीर्णावस्था ) । इन दोनों कालों के अनुसार भेषजयोग ( चिकित्सा का प्रयोग ) किया जाता है ।। २४ ।।

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