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AYUSHKAMI ADHYAY BHAG -1

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•अष्टांगहृदय

आयुष्कामीय अध्याय भाग – 1

आयुष्कामीय अर्थात दीर्घायु अथवा पूर्ण आयु प्राप्त करने वालों के लिए जो हितकर अध्याय हैं वह आयुष्कामीय अध्याय हैं।

“आयुः कामयमानेन धर्मार्थसुखसाधनम् । आयुर्वेदोपदेशेषु विधेयः परमादरः” ॥२ ॥

आयुर्वेद का प्रयोजन — धर्म , अर्थ , सुख ( काम ) नामक इन तीन पुरुषार्थों का साधन ( प्राप्ति का उपाय ) आयु है , अतः आयु ( सुखायु ) की कामना करने वाले पुरुष को आयुर्वेदशास्त्रों में निर्दिष्ट उपदेशों में परम ( विशेष ) आदर करना चाहिए।॥२।।

“ब्रह्मा स्मृत्वाऽऽयुषो वेदं प्रजापतिमजिग्रहत् ।
सोऽश्विनौ तौ सहस्राक्षं सोऽत्रिपुत्रादिकान्मुनीन् ॥ तेऽनिवेशादिकांस्ते तु पृथक् तन्त्राणि तेनिरे ।”

आयुर्वेदावतरण – ब्रह्माजी ने सबसे पहले आयुर्वेदशास्त्र का स्मरण ( ध्यान ) करके उसे दक्षप्रजापति को ग्रहण कराया अर्थात् पढ़ाया था । दक्षप्रजापति ने अश्विनीकुमारों को पढ़ाया था , अश्विनीकुमारों ने देवराज इन्द्र को पढ़ाया था , उन्होंने अत्रिपुत्र ( पुनर्वसु आत्रेय ) आदि महर्षियों को पढ़ाया था ; आत्रेय आदि ने अग्निवेश , भेड़ , जतूकर्ण , पराशर , हारीत , क्षारपाणि आदि को पढ़ाया था और फिर अग्निवेश आदि महर्षियों ने अलग – अलग तन्त्रों आयुर्वेदशास्त्रों ) की विस्तार के साथ रचना की ॥३ ॥

“तेभ्योऽतिविप्रकीर्णेभ्यः प्रायः सारतरोच्चयः ॥४ ॥ क्रियतेऽष्टाङ्गहृदयं नातिसङ्केपविस्तरम् । “

अष्टांगहृदय का स्वरूप — महर्षि वाग्भट का कथन है कि इधर – उधर बिखरे हुए उन प्राचीन तन्त्रों में से उत्तम – से – उत्तम ( सार ) भाग को लेकर यह उच्चय ( संग्रह ) किया गया है । प्रस्तुत संग्रह – ग्रन्थ का नाम है — ‘ अष्टांगहृदय ‘ । इसमें प्राचीन तन्त्रों में वर्णित विषय न अत्यन्त संक्षेप से और न अत्यन्त विस्तार से ही गये।

“कायबालग्रहोर्ध्वाङ्गशल्यदंष्ट्राजरावृषान् ॥५ ॥
अष्टावङ्गानि तस्याहुश्चिकित्सा येषु संश्रिता । “

आयुर्वेद के आठ अंग -१ . कायचिकित्सा , २. बालतन्त्र ( कौमारभृत्य ) , ३. ग्रहचिकित्सा ( भूतविद्या ) , ४. ऊवांगचिकित्सा ( शालाक्यतन्त्र ) , ५. शल्यचिकित्सा ( शल्यतन्त्र ) , ६. दंष्ट्राविषचिकित्सा ( अगदतन्त्र ) , ७. जराचिकित्सा ( रसायनतन्त्र ) तथा ८. वृषचिकित्सा ( वाजीकरण – तन्त्र ) —ये आठ अंग कहे गये हैं । इन्हीं अंगों में सम्पूर्ण चिकित्सा आश्रित है ॥५ ॥

“वायुः पित्तं कफश्चेति त्रयो दोषाः समासतः “॥६ ॥

दोषों का वर्णन — आयुर्वेदशास्त्र में संक्षेपतः तीन ही दोष माने जाते हैं ; यथा —१ . वात , २. पित्त तथा कफ ॥ ६ ॥

“विकृताऽविकृता देहं घ्नन्ति ते वर्तयन्ति च ।”

विकृत – अविकृत दोष — ये तीनों वात आदि दोष विकृत ( असम अर्थात् बढ़े हुए अथवा क्षीण हुए ) शरीर का विनाश कर देते हैं और अविकृत ( समभाव में स्थित ) जीवनदान करते हैं अथवा स्वास्थ्य – सम्पादन करने में सहायक होते हैं ।

“ते व्यापिनोऽपि हन्नाभ्योरधोमध्योर्ध्वसंश्रयाः” ॥७ ॥

दोषों के स्थान तथा प्रकोपकाल ये तीनों वात आदि दोष सदा समस्त शरीर में व्याप्त रहते हैं । फिर भी नाभि से निचले भाग में वायु का , नाभि तथा हृदय के मध्य भाग में पित्त का और हृदय के ऊपरी भाग में कफ का आश्रयस्थान है || ७ ||

“वयोऽहोरात्रिभुक्तानां तेऽन्तमध्यादिगाः क्रमात् “।

वय आदि के अनुसार काल — यद्यपि ये दोष सदा गति ( क्रिया ) शील रहते हैं , तथापि वयस् के अन्तकाल ( वृद्धावस्था ) में , वयस् के मध्य ( यौवन ) काल में तथा वयस् के आदि ( बाल्य ) काल में और दिन – रात तथा भुक्त ( भोजन कर चुकने ) के अन्त , मध्य एवं आदि काल विशेष रूप से गतिशील होते हैं ।

“तैर्भवेद्विषमस्तीक्ष्णो मन्दश्चाग्निः समैः समः” ।।८ ॥

दोषों का अग्नि पर प्रभाव – उक्त वात आदि दोषों के प्रभाव ( वृद्धि ) से अग्नि ( जठराग्नि ) भी दोषों के क्रम ( वातदोष ) से विषम , ( पित्तदोष से ) तीक्ष्ण और ( कफदोष से ) मन्द हो जाता है तथा इन तीनों के सम मात्रा में रहने पर अग्नि भी सम प्रमाण में रहता है।।८ ।।

“कोष्ठः क्रूरो मृदुर्मध्यो मध्यः स्यात्तैः समैरपि “।

दोषों का कोष्ठ पर प्रभाव – जठराग्नि की भाँति कोष्ठ भी वातदोष से पित्तदोष से मृदु एवं कफदोष से मध्यम रहता है और तीनों दोषों के सम रहने पर भी मध्यम रहता है ।

“शुक्रार्तवस्थैर्जन्मादौ विषेणेव विषक्रिमः॥९ ॥
तैश्च तिम्रः प्रकृतयो हीनमध्योत्तमाः पृथक् ।
समधातुः समस्तासु श्रेष्ठा , निन्द्या द्विदोषजाः” ॥

दोषों से गर्भ – प्रकृति का वर्णन गर्भाधान काल में माता – पिता के आर्तव तथा शुक्र में अधिकता से उपस्थित या वर्तमान उक्त तीनों ( वात आदि ) दोषों के अनुसार क्रमश : गर्भ की तीन प्रकृतियाँ बनती हैं ।
१. वातदोष की अधिकता से हीनप्रकृति ,
२. पित्तदोष की अधिकता से मध्यप्रकृति तथा
३. कफदोष की अधिकता से उत्तमप्रकृति बनती है ; यही सबमें श्रेष्ठ मानी गयी है । जो प्रकृतियाँ दो – दो दोषों के मिश्रण से बनती हैं , वे निन्दनीय मानी जाती हैं और समधातुज प्रकृति सबमें श्रेष्ठ होती है ।
शुक्र एवं आर्तव किंवा रजस् तथा वीर्य के मिश्रण से उत्पन्न गर्भ में वात आदि दोषों के गुण वैसे ही आ जाते हैं । जैसे विषक्रिमि में विष के गुण आ जाते हैं।।९ -१० ॥

“तत्र रूक्षो लघुः शीतः खरः सूक्ष्मश्चलोऽनिलः ।”

वातदोष के गुण — यह रूक्ष , लघु , शीत , खर , सूक्ष्म तथा चल ( सदा गतिशील ) होता है ।

“पित्तं सस्नेहतीक्ष्णोष्णं लघु विसं सरं द्रवम् “॥ ११ ॥

पित्तदोष के गुण — यह कुछ स्निग्ध , तीक्ष्ण , उष्ण , लघु , विन ( आम गन्ध वाला ) , सर तथा द्रव होता है।॥११ ॥

“स्निग्धः शीतो गुरुर्मन्दः श्लक्ष्णो मृत्स्नः स्थिरः कफः ।”

कफदोष के गुण – स्निग्ध , शीत , गुरु , मन्द , श्लक्ष्ण , मृत्स्न तथा स्थिर होता है ।

“संसर्गः सन्निपातश्च तद्वित्रिक्षयकोपतः “॥१२ ॥

संसर्ग तथा सन्निपात की परिभाषा — आयुर्वेदीय परिभाषा के अनुसार किन्हीं दो – दो दोषों के एक साथ क्षय या वृद्धि होने का नाम ‘ संसर्ग ‘ है और तीनों दोषों का एक साथ क्षय अथवा वृद्धि होने का नाम सन्निपात है ।॥ १२ ॥

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