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AYURVEDA KA PRAYOJAN

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आयुर्वेद का प्रयोजन

आयुर्वेद शास्त्र के दो प्रयोजन हैं –
( 1 ) स्वस्थ मनुष्य के स्वास्थ्य की रक्षा करना तथा
( 2 ) रोगी मनुष्य के रोग का निवारण करना ।

“प्रयोजनं चास्य ( आयुर्वेदस्य ) स्वस्थस्य स्वास्थ्यरक्षणमातुरस्य विकारप्रशमनं च ।” ( च ० सू ० 30/24 )

आयुर्वेद की परिभाषा

“हिताहितं सुखं दुःखमायुस्तस्य हिताहितम् । मानं च तच्च यत्रोक्तमायुर्वेदः स उच्यते ।” ( च ० सू ० 1/40 )

अर्थात् जिस शास्त्र में हितमय , अहितमय सुखायु एवं हितमय , अहितमय दुःखायु का तथा आयु के मान का वर्णन हो उसे आयुर्वेद कहते हैं ।

चिकित्स्य पुरुष ( कर्म – पुरुष )

भारतीय दर्शन ग्रंथों में चेतना धातु मात्र को पुरुष संज्ञा दी गई है ।
यहां पुरुष शब्द का व्यवहार ‘ पुरि वसति इति पुरुषः ‘ अर्थात् जो शरीर में रहता है वह पुरुष है के अर्थ में किया गया है । शरीर में चेतना के प्रतीक आत्मा का निवास है अतः उसकी संज्ञा पुरुष की गई है ।

कर्म – पुरुष के गुण

“खादयश्चेतनाषष्ठधातवः पुरुषः स्मृतः ।”( च ० शा ०1 / 15 )

जीवन के लक्षणयुक्त कर्म पुरुष अर्थात् चिकित्स्य पुरुष के गुण ये हैं- सुख , दुःख , इच्छा , द्वेष , प्रयत्न , ( कायिक , वाचिक एवं मानसिक कर्म में प्रवृत्ति ) , प्राण ( श्वसन क्रिया ) , अपाने ( निर्हरण क्रिया ) उन्मेष , निमेष , बुद्धि ( व्यावहारिक ज्ञान ) , मनःसंकल्प , विचारणा , स्मृति , विज्ञान , अध्यवसाय [ कार्य करने का निश्चय ] तथा विषयोपलब्धि [ इन्द्रियों द्वारा विषयों का ज्ञान ] ये सोलह कर्म पुरुष के गुण होते हैं । कर्म पुरुष ही चिकित्सा का अधिकरण है ।

पुरुष एवं लोक

मनुष्य सृष्टि का अंश है इसलिए उसमें तथा सृष्टि में समानता होना स्वाभाविक है । इस समानता को आचार्यों ने भली – भांति दर्शाया है ।
उन्होंने स्पष्ट कहा हैं जितने भी मूर्तिमान विशेष भाव इस लोक [ प्रकृति में हैं वे सब पुरुष [ कर्म पुरुष ] में भी होते हैं तथा जो पुरुष में हैं वे सब लोक में हैं ।
इस प्रकार लोक एवं पुरुष सादृश्य है । लोक और पुरुष की इस समता सम्बन्धी ज्ञान से दोनों में अन्तर करनेवाली विभेदक बुद्धि नष्ट हो जाती है और मनुष्य में सत्य बुद्धि उदय होती है जिससे संसार के समस्त प्राणिमात्र में अपनत्व उत्पन्न होता है ।

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