fbpx

AATMA

by

• आत्मा

•निरूक्ति-

" आत्मा तते वप्ति वापि इव स्याद् यावद् व्याप्तिभूत इति । "
( निरूक्त ३/१३/२ )

आत्मा शब्द ‘ अत् ‘ या ‘ अप् ‘ धातु से निष्पादित हुआ है । अप् धातु का अर्थ होता है – सतत चलना और अत् धातु का अर्थ है – व्याप्त होना ।
आत्मा सर्वदा चलती रहती है और यह सर्वत्र व्याप्त है ।

यह आत्मा ही ज्ञाता , कर्ता और भोक्ता है । शरीर ( पांचभौतिक ) , मन और इन्द्रियां ( ५ ज्ञानेन्द्रियां + ५ कमेंन्द्रियां ) इनके कार्य और ज्ञान का माध्यम हैं । सुख : -दुःख , इच्छा द्वेष आदि इनके गुण हैं । इन्हीं कर्म और गुण के आधार पर इनकी द्रव्यता ( कारण द्रव्य ) सिद्ध की जाती है । निराकार , अनादि और आयु से समवाय सम्बन्ध होने के कारण यह नित्य है , क्योंकि जब शरीर से इसका सम्बन्ध समाप्त हो जाता है तब व्यक्ति को जीवित या आयु की संज्ञा नहीं देते हैं ।

•लक्षण –
आत्मा को ‘ पुरुष ‘ और ‘ परमात्मा ‘ भी कहा है इसके लक्षणों का वर्णन करते हुये कहा गया है कि प्राण और अपान वायु का चलना , निमेष – उन्मेष ( पलकों का गिरना – उठना ) , जीवन , मन की गति , इन्द्रियान्तर संचार अर्थात् मन का एक इन्द्रिय को छोड़कर दूसरे इन्द्रिय के साथ संयोग होना , मन का इन्द्रिय को कार्य करने की प्रेरणा ( आज्ञा ) देना , इन्द्रियों को कार्य करने से धारण करना ( रोकना ) , स्वप्न में देशान्तर गमन करना , शरीर में मात्र पञ्चमहाभूत का ही रह जाना अर्थात् मृत्यु हो जाना , इच्छा – द्वेष , सुख दुःख , प्रयत्न , चेतना , धृति ( धैर्य ) , बुद्धि , स्मरण – शक्ति और अहंकार का होना ये ( परमात्मा या आत्मा ) के लक्षण हैं।

आयुर्वेद में आत्मा से तीन अर्थ लिये गये हैं
१. परमात्मा ,
२. अतिवाहिक या सूक्ष्म शरीर युक्त आत्मा और
३. स्थूल चेतन शरीर या कर्म पुरुष ।

१. परमात्मा – इसे वैशेषिक दर्शन ने एक , सर्वज्ञ , सर्वशक्तिमान , सर्वव्यापी , नित्य , ज्ञान का अधिकरण और जगत् का कर्ता ‘ ईश्वर ‘ माना है । जबकि चरक ने इसे अव्यक्त , क्षेत्रज्ञ , शाश्वत ( उत्पत्ति और विनाश से रहित ) एवं विभु ( सर्वव्यापक ) कहा है ।

२.जीवात्मा – शरीर ( पंचमहाभूत ) से बद्ध आत्मा को ‘ जीवात्मा ‘ कहा गया है ।

• चिकित्स्य पुरुष

पंचमहाभूत और आत्मा इन छह धातुओं के समुदाय को लोग या पुरुष का आ गया है यही पुरुष आयुर्वेद का चिकित्सीय पुरुष है चिकित्सा कार्य इसी पुरुष का होता है इसलिए इसे ही कर्म पुरुष भी कहते हैं यही लोग पुरुष और शर्ट धातु जो पुरुष भी है पुणे 24 धातुओं का उल्लेख कर आचार्य ने इस पुरुष को स्पष्ट किया है , जिसमें –
अव्यक्त , महान ( बुद्धि तत्व ) , अहंकार १० इन्द्रियां ( ५ ज्ञानेन्द्रिय + ५ कर्मेन्द्रिय ) , ५ महाभूत , ५ इनके विषय ( पंचमहाभूतों के गुण – शब्द , स्पर्शादि ) और मन है । इन्हें राशि पुरुष कहा गया है।

• षड्धात्वात्मक पुरुष
चरक ने शारीर स्थान में तीन प्रकार के पुरुषों का वर्णन किया है —१ . षड्धात्वज , २. एक धात्वज ( चेतना धातु ) और ३. चतुर्विंशतितत्वात्मक ।
१ . षड्धात्वज( पंचमहाभूत और (चेतना धातु अर्थात मन युक्त आत्मा))
२. एक धातुज ( चतना धातु ) पुरुष
३. चतुर्विंशतितत्वात्मक (इनके अनुसार प्रकृति – विकृति ८ है —१ . मूल प्रकृति , २. महान , ३. अहंकार , ४. शब्द तन्मात्रा , ५. स्पर्श तन्मात्रा , ६.रूप तन्मात्रा , ७. रस तन्मात्रा और ८. गन्ध तन्मात्रा ,
विकृतियां १६ हैं – ९ -१३ . पांच ज्ञानेन्द्रियां ( कर्ण , त्वचा , चक्षु , रसना और नासिका ) , १४-१८ . पांच कर्मेन्द्रियां ( हस्त , पाद , जिह्वा , गुदा और उपस्थ ) , १ ९ -२३ . पांच महाभूत ( आकाश , वायु , अग्नि , जल और पृथ्वी ) , २४ . उभयात्मक मन और २५. पुरुष जो न प्रकृति है और न विकृति है ।)

2 thoughts on “AATMA”

  1. गुरु जी, सादर चरण स्पर्श.
    गुरु जी, ऐसा भी कहा जाता है कि, आत्मा को तो, कोई ज्ञान ही नही होता है,,
    “निर्विकार: परस्वात्मा सत्वभूतगुणैन्द्रेयी,
    चेत्यन्ये हि कारणम् दृष्टा पश्यति हि क्रिया”

    सादर…

    Reply

Leave a Comment

error: Content is protected !!