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आरग्वधीय अध्याय

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आरग्वधीय अध्याय

•आचार्य चरक ने सिद्धनतम चूर्ण /लेप/ प्रदेह की संख्या 32 बतलाई है।
इस अध्याय में कुल सूत्रों की संख्या 30 है।
कुल 32 लेपो मे
15 कुष्ठनाशक
4 वात विकार नाशक
3 वातरक्त नाशक
2 शिरशूल नाशक
2 दाह शामक
1 उदर शूल नाशक
1 पार्श्व शूल नाशक
1 शीतनाशक
1 विषघ्न लेप
1 स्वेदहर लेप
1 दुर्गंध नाशक

बहि परिमार्जन के छः प्रयोग ( १-६ ) –


( १ ) अमलतास ( आरम्बध ) के पत्ते , एडगज ( चकवह ) के बीज , करज के बीज , वासा , गुडूच , मदन , हरिद्रा तथा दारुहरिद्रा ;
( २ ) गन्धविरोजा , देवदारु , खदिर , धव , नीम , विडंग तथा कनेर की छाल ;
( ३ ) भोजपत्र की गोठे , लहसुन , शिरीष , लोमश , गुग्गुल तथा कृष्णगन्ध ( सहिजन ) की छाल ;
( ४ ) फणिज्दाक ( बनतुलसो , तुलसीभेद ) , वत्सक , सप्तपर्ण , पोलु , कुष्ठ तथा चमेली के कोमल नये पत्तेः
( ५ ) वचा , हरेणु , त्रिवृत , निकुम्भ , भल्लातक तथा गैरिक एवं अंजन ;
( ६ ) मैनसिल , हरताल , गृहधूम , एला ( छोटी इलायची ) , कासीम , लोध्र , अर्जुन , नागरमोथा तथा सर्ज — ये छ . योग आधे – आधे श्लोकों में कहे गये है । इनमें से प्रत्येक औषध का चूर्ण बनाकर उसमें गोपित्त ( गोरोचन ) की भावनाएं दें , जिससे चूर्ण का वर्ण पीला हो जाये । फिर इन्हें पुनः पीसकर सरसों का तेल मिलाकर चिकित्सक इनका लेप कराये । इन लेपों के लगाने से कृच्छ्रसाध्य कुष्ठ , नया श्वेत कुष्ठ ( Leucoderma ) , इन्द्रलुप्त ( Alopecia ) , किटिभ ( कुष्ठभेद / Psonasis ) , दाद ( Ringworm ) , ( Fistula in ano ) , अर्श ( Piles ) , अपची ( Cervical adenitis ) तथा पामा ( Scabies ) रोग शीघ्र नष्ट हो जाते हैं।


( ७ ) कुष्ठादि लेप –
कूठ , हल्दी , दारुहरिद्रा , सुरसा , पटोल , नीम , अश्वगन्धा , सुरदारू , शिग , सर्षप , तुम्बा , धनिया , वन्य ( केवटी ) तथा चण्डा – इन सबको समान भाग लेकर चूर्ण कर लें । फिर चूर्ण को मट्ठे के साथ घोट ले । तत्पश्चात् रोगी के शरीर में तेल की मालिश करके इस लेप को उबटन की तरह मल कर लगायें । इसका प्रयोग करने से कण्डू ( खुजली ) , पिडका ( फोडा – फुन्सी ) , कोठ ( लाल चकते ) , अनेक प्रकार के कुष्ठ और अनेक प्रकार के शोथ रोग शान्त हो जाते हैं।


( ८ ) कृष्ठादि चूर्ण –
कूठ, गुडूच , तूतिया , दारुहल्दी , कासीस , कम्पिल्लक , नागरमोथा , लोध्र , गन्धक , राल , विडंग तथा मैनसिल , हरताल , कनेर के मूल की छाल – इन सबका चूर्ण बना लें । रोगी के शरीर में पहले सरसों के तेल की मालिश कराये , जिससे उसका शरीर तरबतर हो जाय , फिर उपर्युक्त चूर्ण को अवचूर्णन के लिए दें ।


( ९ ) मनःशिलादि प्रदेह –
मैनसिल , पिण्डहरिताल , काली मरिच , सरसों का तेल , मदार का दूध ( इन्हें एक साथ पोटकर ) लेप योग्य बना लें । यह कुष्ठनाशक प्रदेह है ।


( १० ) तुत्थादि लेप –
तूतिया , विडंग , मरिच , कूठ , लोध्र और मैनसिल का ( एकत्र सरसों के तेल में खूब घोटकर ) लेप बना लें । यह भी कुष्ठनाशक लेप है।


( ११ ) रसाञ्जनादि लेप –
रसांजन और चकवड के बोज – इन दोनों को समान भाग लेकर कैथ के रस में घोटकर लेप करना चाहिए

( १२ ) करंजादि लेप –
करज के बीज , चकवड़ के बीज तथा कूठ – इन तीनों को गोमूत्र में पीसकर लेप करना चाहिए । यह उत्तम कुष्ठनाशक लेप है।


( १३ ) हरिद्रादि लेप —
हल्दी , दारुहल्दी , फूटज , करज का बीज , चमेली की कोमल पत्तियो , हयमारक ( कनेर ) के मूल की छाल और उसके फल की मींगो तथा तिलक्षार – नें समभाग लेकर ( गोमूत्र से ) पोसकर कुष्ठ पर लेप करना चाहिए ।

( १४ ) मन शिलादि लेप –
मैनसिल , कुटज की छाल , कूठ , कासीस , चकवड का बीज , करंज का बीज , भोजपत्र की गाँठ और कनेर की जड़- सबका ( प्रत्येक का ) पूर्ण १-१ कर्ष ( २४-२४ ग्राम ) लेकर ‘ तुषोदक ‘ और पलाशस्थरस के 1-1 आढ़क ( ६.५ लीटर ) द्रव्य में मन्द आंच पर पकायें । जब पककर गाढा हो जाय और कडछुल में लगाने लगे तो उतार लें । यह उत्तम कुष्ठनाशक लेप है ।


( १५ ) आरग्वधादि लेप –
आरग्वध के पत्ते , काकमाची और कनेर के पत्ते समभाग लेकर मट्ठे में पीसकर उबटन बनायें । रोगी के शरीर में सरसों के तेल की मालिश करके इस उबटन को लगायें । यह कुष्ठनाशक है।॥


( १६ ) कोलादि लेप –
बेर , कुलथी , देवदार , रास्ना , उदय , तेलफल – सरसों , एरण्डबीज , तिल आदि , कूठ ,वच, सौंफ सब का चूर्ण इन सब का चूर्ण लेकर कांजी में पीसकर सुखोष्ण बनाकर वात रोग से पीड़ित व्यक्ति का लेप कराएं। यह वातहर लेप है।


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