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AAHAR PAAK

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आहार पाक

“आहार्यते गलादधोनीयत अत्याहारः।”

जिस द्रव्य का निगरण होता है अर्थात् निगला जाता है वह आहार कहलाता है ।
भिन्न – भिन्न प्रकार के खाने – पीने के द्रव्यों में निगलने की क्रिया समान होने के कारण सबको आहार कहते हैं।

• आहार द्रव्यों की दो योनि हैं अर्थात् प्राप्तिस्थान भेद से दो प्रकार के होते हैं ।
( 1 ) स्थावर ( वृक्ष आदि ) तथा
( 2 ) जंगम ( पशु आदि ) ।

•प्रभाव भेद से भी आहार द्रव्य दो प्रकार के होते हैं
( 1 ) हितकर प्रभाव वाले द्रव्य तथा
( 2 ) अहितकर प्रभाव वाले द्रव्य ।

• उपभोग भेद से आहार द्रव्य चार प्रकार के होते हैं
( 1 ) पान ( पीने योग्य ) .
( 2 ) अशन ( कोमल परन्तु चबाकर निगलने योग्य ) ,
( 3 ) भक्ष्य ( कठोर भलीभांति चबाकर निगलने योग्य ) तथा
( 4 ) लेह्य ( चाटने योग्य ) । इन भेदों से आहार द्रव्यों का चार प्रकार से उपयोग होता है।

आहार मात्रा

राशि ( मात्रा ) की दृष्टि से आहार दो प्रकार का होता है-
[ 1 ] मात्रायुक्त अर्थात् उचित मात्रा में होना अथवा
[ 2 ] उचित मात्रायुक्त नहीं होना ।

आहार उचित मात्रा में न होना भी दो प्रकार का होता है –
[ 1 ] हीनमात्रा- उचित मात्रा से कम होना तथा
[ 2 ] अतिमात्रा- उचित मात्रा से अधिक होना ।

•आहारविधि विशेषायतन

आठ आहारविधि विशेषायतन हैं-
( 1 ) प्रकृति , ( 2 ) करण( आहार को संस्कारित अर्थात सफाई करना ) , ( 3 ) संयोग , ( 4 ) राशि( प्रमाण या मात्रा) , ( 5 ) देश , ( 6 ) काल , ( 7 ) उपयोग संस्था आहार उपयोग के नियम )तथा ( 8 ) उपयोक्ता ( आहार का सात्म्य हो जाना)।

•आहार पाक की दो अवस्थाएं होती हैं
1.अवस्था पाक और
2.निष्ठा पाक( विपाक)

  1. अवस्थापाक

अन्न प्रणाली [ महास्रोतसः कोष्ठ ] में आहार जब पहुंच जाता है , पाचनक्रिया आरम्भ हो जाती है । पाचनकाल में आहार द्रव्यों में जो परिवर्तन होते हैं वे तीन अवस्थाओं से गुजरते हैं ।

पाचन की ये तीन अवस्थायें निम्न प्रकार हैं
[1 ]मधुर अवस्था पाक [ भुक्तमानावस्था , आमावस्था ]- इस समय कफ की उत्पत्ति होती है।
[ 2 ] अम्ल अवस्था पाक [ पच्यमानावस्था , विदग्धावस्था ] – इस समय पित्त की उत्पत्ति होती है।
[ 3 ] कटु अवस्था पाक [ पक्वावस्था ]- इस समय वायु की उत्पत्ति होती है।

  1. निष्ठापाक ( विपाक )

आहार के पाचन के पश्चात् उसके सार अंश का आन्त्रभित्ति द्वारा अवशोषण हो जाता है । शोषण होने के पश्चात् इस अन्न रस में जो परिवर्तन होते हैं उन्हें निष्ठापाक तथा विपाक कहते हैं।

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