शल्य परिचय

• शल्य तंत्र परिभाषा
• शल्य तंत्र प्रधानता
• महत्त्व
• शल्य
• शल्य शस्त्र

शल्य तंत्र परिभाषा

तत्र , शल्यं नाम विविधतृणकाष्ठपाषाणपांशुलोहलोष्टास्थिबालनखपूयास्रावदुष्टव्रणान्तर्गर्भशल्योद्धरणार्थं यन्त्रशस्वक्षाराग्निप्रणिधानव्रणविनिश्चयार्थञ्च ।।(su.su,१/९ )

आयुर्वेद के जिस अङ्ग में अनेक प्रकार के तृण ( घास ) , काष्ठ ( लकड़ी ) , पत्थर , धूलि के कण , लौह , मिट्टी , हड्डी , केश , नाखून , पूय ( मवाद = Pus ) , स्त्राव ( Discharge ) , दूषित व्रण , अन्तःशल्य तथा गर्भ ( मृतगर्भ ) शल्य आदि को निकालने का ज्ञान , यन्त्र , शस्त्र , क्षार और अग्निकर्म करने का ज्ञान तथा व्रणों का आम , पच्यमान और पक्व आदि का निश्चय किया जाता हो उसे शल्यतन्त्र कहते हैं ।


• शल्य तंत्र प्रधानता

शल्य – शालाक्यादि आठ आहों में शल्य अन ही मुख्य है क्योंकि पूर्व समय में देव – दानव युद्ध में प्रहारजन्य गणों के रोपण करने से तथा यज्ञ के कटे हुए सिर का सन्धान कर देने से इसी आग को प्रधान माना है । यह सुनने में आता प्रकुपित शिव ने यज्ञ का शिरश्छेदन कर दिया था , तब देवताओं ने अश्विनीकुमारों के पास जाकर कहा कि आप हमारे में अतिश्रेष्ठ होंगे । आपको यज्ञ के कटे सिर का सन्धान करना चाहिये । दोनों ने कहा ऐसा ही हो , तम देवताओं ने अभिनीकुमारों को यश का भाग मिलने के लिये इन्द्र को प्रसार किया । इस तरह अश्विनीकुमारों ने यज्ञ के कटे सिर का सन्धान किया ॥१/२५ ॥
अतः -इस वर्णन से शल्यशास्त्र कि प्रधानता तथा शल्यकोविद का समान विदित होता है ।

अष्टास्यपि चायुर्वेदतबेष्वेतदेवाधिकमभिमतम् , आशुक्रियाकरणात् , यन्त्रशस्त्रक्षाराग्निप्रणिधानात् , सर्वतन्त्र सामान्याच्च ।। सु . सू१/२६ ।।
आशु ( शोध ) क्रिया करने से , यन्त्र , शख , क्षार और अग्नि का प्रयोग करने से तथा अन्य सर्वतन्त्रों के समान चिकित्सा इसमें होने से आठों तन्त्र में यही शल्य तंत्र अधिक माननीय है ॥

शल्य तंत्र महत्त्व :

तादिदं शाश्र्व्तं पुण्यं स्वगर्य् शस्यमायुष्यं वृत्तिकरञ्चेति ।। सु. सू.१/२७ ।।
यह शल्यतन्त्र शाश्वत ( नित्य ) , पुण्यदायक , स्वर्गदायक , यश करने वाला , आयु के लिये हितकर तथा जीविकोपयोगी है।
-चरक में भी अनेक स्थल पर शल्यचिकित्सा का महत्व स्वीकृत किया गया है ।

शल्य:
तत्र , मनः शरीराबाधक रानि शल्यानि। (सु. सू १)
मन और शरीर को बाधा ( दुःख ) पहुँचाने वाले भावों को शल्य ‘ कहते हैं।


सर्वशरीराबाधकरं शल्यं , तदिहोपदिश्यत इत्यतः शल्यशास्त्रम् ।। सु. सू.२६/४ ।।

समस्त शरीर में जो बाधा या पीडा करता हो उसे शल्य कहते है । उसी शल्य को निकालने के लिये यहाँ उपदेश दिया जाता है इसलिये इसको शल्यशास्त्र कहते हैं ।।

शल्य शास्त्र:

सर्वशरीराबाधकरं शल्यं , तदिहोपदिश्यत इत्यतः शल्यशास्त्रम् ।। सु. सू.२६/४ ।।
समस्त शरीर में जो बाधा या पीडा करता हो उसे शल्य कहते है । उसी शल्य को निकालने के लिये यहाँ उपदेश दिया जाता है इसलिये इसको शल्यशास्त्र कहते हैं ।।


शल्य चिकित्सक गुण:


शौर्यमाशुक्रिया शस्त्रतक्ष्ण्यमस्वेदवेपथु । असम्मोहश्च वैद्यस्य शस्त्रकर्मणि शस्यते । सु. सू५/।१० ।।
शूरता , ( उत्साह , निर्भयता ) ,
शस्त्रपातादिक्रिया में शीघ्रता ( लघुहस्तता ) ,
शस्त्र की धार का उचित तीक्ष्ण होना ,
शस्त्रकर्ष करते समय वैद्य – सर्जन को पसीना न आना तथा हाथ का न काँपना तथा रोगोल्वणता
बड़े शस्त्रकर्म की दशा में या निकला हुए रक्तादि को देख कर मूछित न होना
ये शस्त्रचिकित्सक ( Surgeon ) के गुण हैं और ऐसे ही सर्जन शस्त्रकर्म Operation ) में प्रशस्त होते हैं।

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