यंत्र वर्णन

यंत्र
तत्र , मनःशरीराबाधकराणि शल्यानि , तेषामाहरणोपायो यन्त्राणि ।। सु.सू ७/४ ।।
मन और शरीर को बाधा ( दुःख ) पहुँचाने वाले भावों को शल्य तथा इनको निकालने के उपकरणों या उपायों का नाम ‘ यन्त्र ‘ है ॥

संख्या–
यन्त्रशतमेकोत्तरम् , अत्र हस्तमेव प्रधानतमं यन्त्राणामवगच्छ । यन्त्राणामप्रवृत्तिरेव , तदधीनत्वाद् यन्त्रकर्मणाम् ।।सु. सू ७/३ ।।
यन्त्र एक सौ एक ( १०१ ) होते हैं । यहाँ हाथ को ही प्रधान यन्त्र जानना च प्रयोग असम्भव है क्योंकि यन्त्रकर्म हाथ के बिना असम्भव है।

भेद—
तानि षट्प्रकाराणि , तद्यथा – स्वस्तिकयन्त्राणि , संदंशयन्त्राणि , तालयबाणि , नाहीयन्त्राणि , शलाकायत्राणि , उपयन्त्राणि चेति ।।५ ।
। इन यन्त्रों के आकृतिभेद से ६ प्रकार हैं ।
1.स्वस्तिक यन्त्र ( Cruci form instruments ) 2.सन्दश यन्त्र Forceps )

  1. ताल यन्त्र ( Scoop or Spoon )
  2. नाडी यन्त्र ( Speculum )
    5.शलाका यन्त्र ( Probes )
  3. उप यंत्र
    तत्र चतुर्विंशतिः स्वस्तिकयन्त्राणि , द्वे संदंशयन्त्रे , द्वे एव तालयन्त्रे , विंशतिर्नाड्यः अष्टाविंशतिः शलाकाः , पञ्चविंशतिरूपयन्त्राणि ।।६ ।।
    स्वस्तिकयन्त्र ( २४ ) चौबीस
    सन्दंशयन्त्र ( २ ) दो
    तालयन्त्र ( २ ) दो
    नाडीयन्त्र बीस ( २० ) बीस
    शलाकायन्त्र ( २८ ) अट्ठाइस
    उपयन्त्र ( २५ ) पच्चीस
    अष्टाङ्गहदय ‘ में ( 8 ) चार प्रकार के सन्देशयन्त्र , ( २३ ) तेईस प्रकार के नाडीयन्त्र , ( ३४ ) चौतीस प्रकार के शलाकायन्त्र और ( १ ९ ) उन्नीस प्रकार के उपयन्त्र माने हैं ।

यंत्र के गुण—
समाहितानि यन्त्राणि खरश्लक्ष्णमुखानि च । सुढानि सुरूपाणि सुग्रहाणि च कारयेत् ।।९ ।।

  • यन्त्रों को समाहित ( प्रमाणबद्ध , न अधिक मोटे और न अधिक छोटे )
    *आवश्यकतानुसार कोई खुरदरे
    *कोई मुलायम मुख वाले
  • अत्यन्त मजबूत
    *सुन्दर
    *जिन्हें ठीक तरह से हाथ में पकड़ सकें ऐसे बनावें ॥

यंत्र कर्म—
यन्त्रकर्माणि तु – निर्घातनपूरणबन्धनव्यूहनवर्तनचालनविवर्तनविवरणपीडनमार्गविशोधनविकर्षणाहर णाञ्छनोन्नमनविनमनभञ्जनोन्मथनाचूषणैषणदारणर्जूकरणप्रक्षालनप्रधमनप्रमार्जनानि चतुर्विंशतिः ॥
( सु. सू७/१८ )॥
यन्त्रों के कार्य –
*निर्घातन ( Hammering ) ,
*नेत्र , बस्ति , शिरोबस्ति का तैलादि द्वारा पूरण ,
*रज्ज्वादि से बन्धन ,
*शल्य को निकालने के लिये व्यूहन ,
*अवयवों को यथास्थान में वर्तन ( स्थापन ) ,
*शल्य का चालन ,
*शल्य को पकड़ कर विवर्तन ( निष्कासन ) करना , *व्रणादि के मुख का विवरण ( Dilatation ) ,
*व्रणगत पूय निकाल को अंगुलियों या औषध द्वारा पीड़न ( दबाना ) ,
*अवरुद्ध मल – मूत्रों का औषध तथा शलाका द्वारा मार्ग विशोधन ,
*शल्यादि को पकड़ कर विकर्षण करना ( खींचना Extraction ) ,
*आहरण ,
*आञ्छन ( संकुचिताङ्गप्रसारण Extension ) , *अधःस्थित शल्य अथवा अस्थि का उनमन ( ऊपर उठाना Elevation ) ,
*उभरी हुई अस्थि को विनमन ( नीचे दबाना Depression )
*शल्य का भजन ( खण्डन करना Crushing ) , *शलाका द्वारा उन्मथन ( विलोडन Sounding ) , *मुख या शृङ्ग से दूषित रक्त या पूयादि का चूषण ( Suction ) ,
*नाड़ीव्रणादि में अज्ञातमार्ग का एषण ( खोज Probing or Exploration ) ,

  • चिरबिल्वादिदारक गणौषधलेप द्वारा पक्व शोथ का दारण ऋजुकरण ( सीधा करना ) ,
    *निम्ब , त्रिफलादि कषाय द्वारा व्रणादिका प्रक्षालन , *नासा और कर्ण में औषध चूर्ण का प्रघमन ( Insuffition ) तथा
    *अंगुलि या वखादि द्वारा प्रमार्जन ( स्थान को साफ करना )
    ये २४ कर्म का वर्णन किया है ।

यंत्र दोष—-
तत्र अतिस्थूलम् , असारम् , अतिदीर्घम , अतिहस्यम , अग्राहि , विषमग्राहि , वर्क शिथिलम , अत्यु , मृदुकील , मृदुमुखं , मृदुपाशमिति द्वादश यन्त्रदोषाः ।। सु. सू७/२० ।।
यन्त्रों के बारह दोष होते हैं ।

  • अतिस्थूल , असार ( अशुद्ध लौहनिर्मित ) , लम्बा , अधिक छोटा , श्रवाई ( हत्था खराब होने से प्रयोगकर्ता पकड़ न सके अथवा वह यन्त्र शल्य को न पकड़ सके ) , विषमग्राही ( कभी पकड़े की पकड़े ) , वक्र ( टेढा ) , ढीला , अत्युनत ( कीलादि उठी हो ) जिसकी कील शिथिल हो , मुख पर मुलायमी हो जिससे शल्यादि का पीड़न न हो सके , तथा मृदुपाश ॥

1 thought on “यंत्र वर्णन”

Leave a Comment