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चिकित्सा भेद तथा चिकित्सा चतुष्पाद

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• भेषज के प्रकार
• चिकित्सा के प्रकार
• चिकित्सा चतुष्पाद

भेषज के प्रकार-
भेषज दो प्रकार की होती है-

1.स्वस्थस्योर्जस्करं –
स्वस्थ व्यक्ति के उत्तम भाव को बढाने वाला ।

2.आर्त्तस्य रोगनुत् –
रोगाक्रान्त व्यक्ति के रोग को दूर करने वाला ।

चिकित्सा के भेद

1.एकविध चिकित्सा
i .निदान परिवर्जन

2.द्विविध चिकित्सा – इसके निम्न भेद हैं

i. शीत
ii. उष्ण

i. संतर्पण ( बृंहण )
ii. अपतर्पण ( लंघन )

i. शोधन
ii. शमन

i. ऊर्जस्कर
ii. रोगघ्न

i. रसायन
ii. वाजीकरण

i. रोग प्रशमन
ii. अपुनर्भव

i. द्रव्यभूत
ii. अद्रव्यभूत

3.त्रिविध चिकित्सा

( i ) युक्ति व्यपाश्रय
( ii ) दैव व्यपाश्रय
( iii ) सत्वावजय

( i )अंतः परिमार्जन
( ii ) बहि : परिमार्जन
( iii ) शस्त्र प्रणिधान

( i ) आसुरी
( ii ) मानुषी
( iii ) देवी

( i ) भौम
( ii ) औद्भिद्
( iii ) जांगम

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https://youtu.be/YXQFAn7TigE

4.चर्तुविध चिकित्सा : -4-

1 संशोधन
2 सुशमन
3 आहार
4 आचार ।

5.पंचविध चिकित्सा :

वमनं रेचनं नस्यं निसहश्चानुवासना । एतानि पंचकर्माणि कथितानि मुनीश्वरैः ।।

1.वमन

2.विरेचन

3.अनुवासन बस्ति व

4.निरूह बस्ति ।

5.नस्य – इन पाँचों कर्मो को पंचकर्म कहते हैं ।

6.षड्विध चिकित्सा –
इन्हें षडुपक्रम भी कहते हैं , जो निम्न हैं ( च.सू. 22 / 9-11 )

( i ) लंघन
( ii ) बृंहण
( iii ) रुक्षण
( iv ) स्नेहन
( v ) स्वेदन
( vi ) स्तम्भन

7.सप्तविध चिकित्सा
शमन चिकित्सा के निम्न 7 प्रकार कहे हैं ( अ.ह.सू. 14/7 )
( i. )पाचन
( ii ) दीपन
( iii ) क्षुधा
( iv ) तृषा
( v ) व्यायाम
( vi ) आतप सेवन
( vii ) मारूत सेवन

8. शल्य तंत्रीय चिकित्सा के भेदः
शल्य तंत्र में 8 प्रकार के शस्त्रकर्मों का वर्णन किया गया है जो निम्न हैं ( सु.सू. 5/5 )

( i ) छेदन
( ii ) भेदन
( iii ) लेखन
( iv ) वेधन
( v ) एषण
( vi ) आहरण
( vii ) विस्त्रावण
( viii ) सीवन

9. दशविध भेद –
लंघन चिकित्सा के निम्न 10 भेद बताये गए हैं ( च.सू. 22/18 )

( i ) वमन
( ii ) विरेचन
( iii ) निरुह वस्ति
( iv ) नस्य
( v ) पिपासा
( vi ) वायु सेवन
( vii ) आतप सेवन
( viii ) पाचन
( ix ) उपवास
( x ) व्यायाम

चिकित्सा चतुष्पाद

किसी भी रोग के उपचार में चिकित्सा के चारों पाद आवश्यक होते हैं जो निम्र प्रकार हैं

i . भिषक् या चिकित्सक ( Skilled & well trained physician )
ii . द्रव्य ( Medicine / Drugs )
iii . उपस्थाता ( Nursing Staff )
iv . रोगी ( Patient )

1.भिषक् या चिकित्सक के गुण

1 . शास्त्रों का अच्छी तरह से ज्ञान होना ।
2 . अनेक बार रोगी , औषध निर्माण तथा औषध प्रयोग का प्रत्यक्ष द्रष्टा होना ।
3 . दक्ष होना अर्थात् समय के अनुसार युक्ति की कल्पना करने में परम चतुर होना ।

4.मन , वचन व कर्म से पवित्र होना ।

4. द्रव्य के गुण

1 . बहुलता– औषधियाँ सर्व सुलभ , अनेक गुणों से युक्त , बहुत रोगों को दूर करने वाली एवं प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होनी चाहिऐं ।
2 . योग्यता– औषधि व्याधि नाश में समर्थ होनी चाहिएं ।
3 . अनेक विध कल्पना– एक ही औषध से स्वरस , कल्क , क्वाथ , चूर्ण , वटी , अवलेह आदि कल्पनाओं का निर्माण किया जा सके ।
4 . सम्पन्न– औषध अपने गंध , वर्ण , रस , गुण , वीर्य , विपाक प्रभाव आदि गुणों से युक्त हो ।

3. उपस्थाता के गुण

1.उपचारज्ञता– सेवा कार्य का पूर्ण ज्ञान ।

2. दाक्ष्य- अपने कार्य में दक्ष या निपुण होना ।

3.अनुराग– रोगी के प्रति प्रेम – प्रीति होना ।

4.शौच– आचरण में पवित्रता होना ।

2.रोगी के गुण

1 . स्मृति सम्पन्नता— रोगी की स्मरण शक्ति अच्छी हो ताकि अपने रोग के बारे में सम्पूर्ण जानकारी दे सके ।
2 . निर्देशकारित्व – चिकित्सक के निर्देशों का सम्यक् रुप से पालन करनेवाला होना चाहिए ।
3 . अभीरु– रोगी को निडर एवं उत्तम सत्व गुण युक्त होना चाहिए ।
4 . ज्ञापक– रोग व उसके उपद्रवों को अच्छी तरह से बता सके ।

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