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गर्भावक्रान्ति शारीर ( Embryology )

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गर्भावक्रान्ति शारीर ( Embryology )

गर्भ + अवक्रान्ति

• गर्भ का वास्तविक अर्थ है- शुक्र शोणित संयोग ( Fertilized ovum or embryo ) .

• अवक्रान्ति का अर्थ है- परिवृद्धि

इस प्रकार गर्भावक्रान्ति का अर्थ है- गर्भ की परिवृद्धि- Process of fertilization and development of the foetus .

• गर्भ की परिभाषा

“शुक्र शोणितं जीव संयोगे तु खलु कुक्षिगते गर्भ संज्ञा भवति । ” ( च.शा. ४/५ )

पुरूष शुक्र ( Spermatozoa ) और स्त्री शोणित ( Ovum ) इनका स्त्री के गर्भाशय में संयोग होने पर , जब जीवात्मा प्रवेश करती है , तब ही मनुष्य शरीर के अंकुर की उत्पत्ति होती है । और उसे गर्भ ( Embryo ) की संज्ञा दी जाती है ।

• शुक्र ( वीर्य ) •

• शुक्र की उत्पत्ति

“अस्थ्नो मज्जा ततः शुक्रं प्रजायते ।।”( च ० चि ० 15/15 , अ . ह . शा . 3/62 )

मज्जा से शुक्र की उत्पत्ति होती है ।

• शुक्र के कार्य

शुक्र धातु धैर्य , च्युति , प्रीति , शरीर में बल , हर्ष तथा सन्तानोत्पत्ति के योग्य बीज ( डिम्ब एवं शुक्राणुओं ) की उत्पत्ति करता है । अतः शुक्रधातु गर्भ की उत्पत्ति करती हैं।

• शरीर में शुक्र का परिमाण

शरीर में शुक्र का परिमाण आधी अञ्जलि होता है ।

• शुक्रक्षय के लक्षण

शरीर में शुक्र की क्षीणता होने पर वृषणों एवं शिश्न में वेदना होने लगती है । शुक्र का देर से स्खलन होना , शुक्र के साथ रक्त तक का आ जाना , मैथुन में दुर्बलता होना , मुख का शुष्क होना , क्लीवता एवं अरक्तता आदि क्षीण शुक्र के लक्षण हैं।

• शुक्रवृद्धि के लक्षण

शुक्र की अतिवृद्धि पर स्त्री संग की अधिक इच्छा , शुक्र का अधिक मात्रा में स्खलन तथा शुक्राश्मरी की सम्भावना बढ़ जाती है।

• दूषित शुक्र के लक्षण

शुक्र में आठ दोष पाये जाते हैं-
1.फेनिल [ झागदार ] ,

  1. तनु [ पतला ] ,
    3 . रूक्ष [ अस्निग्ध ] ,
    4.विवर्ण [ स्वाभाविक वर्ण का न रहना ] ,
  2. पूति [ दुर्गन्धमय ]
    6.पिच्छिल [ अधिक चिपचिपा हो जाना ] ,
    7.अन्य धातु संसृष्ट [ अन्य धातुओं से मिश्रित हो जाना ]तथा
  3. अवसादी [ स्खलन के समय अत्यन्त कष्ट का अनुभव करानेवाला अथवा जल के नीचे बैठ जानेवाला ]।

•आर्तव ( रज )

आर्तव के पर्याय – शोणित , रज , ऋतु असृक् , मासिक स्राव आदि हैं ।

•आर्तव का कार्य

“रक्तलक्षणमार्तवं गर्भकृच्च गर्भो गर्भलक्षणम् ।।”

रक्त के समान लक्षण वाला आर्तव गर्भस्थिति का कारक है । गर्भ की स्थिति हो जाने पर गर्भाशय में गर्भ के लक्षण उत्पन्न करता है । (सु ० सू ० 15/19)

आर्तव वृद्धि
“आर्तवमङ्गमर्दमतिप्रवृत्तिं दौर्बल्यं च ।”( सु ० सू ० 15/21 )

आर्तवस्राव की मात्रा सामान्य से अधिक होने पर अंगों में पीड़ा , अधिक रजःप्रवृत्ति तथा दुर्बलता होती है ।

आर्तव क्षय
“आर्तवक्षये यथोचितकालादर्शनमल्पता वा योनिवेदना च ।”( सु ० सू ०15 / 16)

आर्तवक्षय में यथासमय रजोदर्शन न होना अथवा अल्पमात्रा में होना तथा योनि में वेदना ये लक्षण उत्पन्न होते हैं ।

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