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आरग्वधीय अध्याय – भाग -2

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( १७ ) वातहर लेप
जलेचर पशु – पक्षियों का मांस और समभाग मछली के मांस से बने ‘ वेशवार ‘ का सुखोष्ण प्रलेप वातरोग की पीड़ा शान्त करता है ।


( १८ ) द्वितीय वातनाशक लेप –
गन्धद्रव्यो ‘ और दशमूल ( सरिवन , पिठवन , बृहती , कण्टकारी , गोखरू , बेल , गम्भारी , अग्निमन्थ , पाटला तथा श्योनाक ) को पीसकर उसमें घी , तेल , वसा तथा मज्जा मिलाकर गरम लेप लगाने से वातरोग दूर होता है ।


( १ ९ ) उदरशूलनाशक लेप –
मट्ठे में जौ के आटे को यवक्षार मिलाकर पीसकर गरम लेप करने उदरशूल नष्ट हो जाता है ।


( २० ) वातव्याधिहर लेप –
कूठ , सौंफ , वच तथा यव के आटे को कांजी में पीसकर तिल का तेल मिलाकर गरम लेप करने से वातरोग नष्ट होते हैं ।

( २१ ) वातरक्तहर लेप –
सौफ , सोया , मुलहठी , महुआ , बला , प्रियाल , कसेरू , घी , विदारी और मिश्री को एक में पीसकर वातरक्त में लेप करना चाहिए ।


( २२ ) वातरक्तज वेदनाहर लेप –
रास्ना , गुडची , मुलहठी , बला , नागबला , जीवक तथा ऋषभक – इन सबको समभाग लेकर चूर्णकर सब चूर्ण के वजन का चौगुना घी और सोलह गुना गोदुग्ध मिलाकर पाक करें । जब घी मात्र बचे तो उसमें मोम पिघलाकर मिला लें । इस लेप के लगाने से वातरक्त की पीडा शान्त होती है।

( २३ ) गोधूमादि लेप –
गेहूँ का आटा , बकरी का दूध और धृत एकत्र मिला कर पुल्टिस बांधने या लेप करने से वातरक्त की वेदना शान्त होती है ।


( २४ ) शिरःशूलहर लेप-
तगर , उत्पल , सफेदचन्दन , कूठ को घी के साथ घोंटकर उसे लेप करने से शिरःशूल मिट जाता है ।

( २५ ) ( क ) प्रपौण्डरीकादि लेप –
प्रपौण्डरीक , देवदारु , कुष्ठ , मधुयष्टी , एला , कमल , लोह ( अगर ) , उत्पल , एरका , पद्मकाठ तथा चोरक ( चोरपुष्पी ) -इन औषधियों को पीसकर घी मिला कर लेप करने से शिर की पोडा शान्त हो जाती है ।
( ख ) लोहादि शिरःशूलहर लेप –
अगर , एरका ( तृणविशेष पटेरा ) , पद्मकाठ और चोरपुष्पी को पीसकर घी मिलाकर लेप करने से शिर की पीड़ा शान्त हो जाती है।


( २६ ) पाश्र्वशूलनाशक लेप –
रास्ना , हरिद्रा , दारहरिद्रा , नलद ( जटामासी ) , सौंफ , सोया , देवदारु , मिश्री तथा जीवन्ती – इन सबको पीसकर घृत और तेल मिलाकर सुखोष्ण लेप लगाने से पसली की पीड़ा शांत होती है।


( २७ ) दाहशामक लेप –
शैवाल , पद्म , उत्पल , वेत , तुगं ( नागकेशर ) , प्रपौण्डरीक , खम , लोध्र , प्रियगु , कालीयक तथा चन्दन -इन्हें एकत्र पीसकर घी मिलाकर लेप करने से दाह शान्त होता है ।


( २८ ) द्वितीय दाहशामक लेप –
मिश्री , मजीठ , वेतस , पद्मक , मधुयष्टी , इन्द्रवारुणी , कमल , दूर्वा , जवासामूल , कुश , कास , जल तथा एरका – इन सबको सूब बारीक पीसकर लेप लगाने में जलन मिटती है।


( २ ९ ) शीतनाशक लेप –
शैलेय , एला , अगरु , कूठ , चण्डा , तगर , त्वक( दालचीनी ) , देवदार तथा रास्ना – इन सबको एक पीसकर लेप लगाने से शीघ्र ही शीत का निवारण हो जाता है ।


( ३० ) विषघ्न लेप –
शिरीष तथा सिन्धुवार ( मेउडी ) की छाल के लेप से विष का नाश होता है।


( ३१ ) स्वेदहर लेप –
शिरीष की छाल , लामज्जक , हेम ( नागकेशर ) तथा लोघ्र – इन सबका लेप लगाने या त्वचा पर चूर्ण को मलने से त्वचा के विकार और अतिस्वेद विकार नष्ट होते हैं


( ३२ ) पत्रादि लेप –
तेजपात , सुगन्धबाला , लोध , अभय ( सस ) तथा चन्दन का लेप दुर्गन्धनाशक होता है।

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